Tuesday, August 24, 2021

बादशाहत का ख़ात्मा

 स्टोरीलाइन

"सौन्दर्य व आकर्षण के इच्छुक एक ऐसे बेरोज़गार नौजवान की कहानी है जिसकी ज़िंदगी का अधिकतर हिस्सा फ़ुटपाथ पर रात बसर करते हुए गुज़रा था। संयोगवश वो एक दोस्त के ऑफ़िस में कुछ दिनों के लिए ठहरता है जहां एक लड़की का फ़ोन आता है और उनकी बातचीत लगातार होने लगती है। मोहन को लड़की की आवाज़ से इश्क़ है इसलिए उसने कभी उसका नाम, पता या फ़ोन नंबर जानने की ज़हमत नहीं की। दफ़्तर छूट जाने की वजह से उसकी जो 'बादशाहत' ख़त्म होने वाली थी उसका विचार उसे सदमे में मुब्तला कर देता है और एक दिन जब शाम के वक़्त टेलीफ़ोन की घंटी बजती है तो उसके मुँह से ख़ून के बुलबुले फूट रहे होते हैं।"


टेलीफ़ोन की घंटी बजी, मनमोहन पास ही बैठा था। उसने रिसीवर उठाया और कहा, “हेलो... फ़ोर फ़ोर फ़ोर फाईव सेवन...” 

दूसरी तरफ़ से पतली सी निस्वानी आवाज़ आई, “सोरी... रोंग नंबर।” मनमोहन ने रिसीवर रख दिया और किताब पढ़ने में मशग़ूल हो गया। 

ये किताब वो तक़रीबन बीस मर्तबा पढ़ चुका था। इसलिए नहीं कि उसमें कोई ख़ास बात थी। दफ़्तर में जो वीरान पड़ा था। एक सिर्फ़ यही किताब थी जिसके आख़िरी औराक़ कृम ख़ूर्दा थे। 

एक हफ़्ते से दफ़्तर मनमोहन की तहवील में था क्योंकि उसका मालिक जो कि उसका दोस्त था, कुछ रुपया क़र्ज़ लेने के लिए कहीं बाहर गया हुआ था। मनमोहन के पास चूंकि रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। इसलिए फुटपाथ से आरिज़ी तौर पर वो इस दफ़्तर में मुंतक़िल हो गया था और इस एक हफ़्ते में वो दफ़्तर की इकलौती किताब तक़रीबन बीस मर्तबा पढ़ चुका था।

दफ़्तर में वो अकेला पड़ा रहता। नौकरी से उसे नफ़रत थी। अगर वो चाहता तो किसी भी फ़िल्म कंपनी में बतौर फ़िल्म डायरेक्टर के मुलाज़िम हो सकता था मगर वो गु़लामी नहीं चाहता था। निहायत ही बेज़रर और मुख़्लिस आदमी था। इसलिए दोस्त यार उसके रोज़ाना अख़राजात का बंदोबस्त कर देते थे। ये अख़राजात बहुत ही कम थे। सुबह को चाय की प्याली और दो तोस। दोपहर को दो फुल्के और थोड़ा सा सालन, सारे दिन में एक पैकेट सिगरेट और बस! 

मनमोहन का कोई अज़ीज़ या रिश्तेदार नहीं था। बेहद ख़ामोशी पसंद था, जफ़ाकश था। कई कई दिन फ़ाक़े से रह सकता था। उसके मुतअल्लिक़ उसके दोस्त और तो कुछ नहीं लेकिन इतना जानते थे कि वो बचपन ही से घर छोड़ छाड़ के निकल आया था और एक मुद्दत से बंबई के फुटपाथों पर आबाद था। ज़िंदगी में सिर्फ़ उसको एक चीज़ की हसरत थी औरत की मोहब्बत की। “अगर मुझे किसी औरत की मोहब्बत मिल गई तो मेरी सारी ज़िंदगी बदल जाएगी।” 

दोस्त उससे कहते, “तुम काम फिर भी न करोगे।” 

मनमोहन आह भर कर जवाब देता, “काम?... मैं मुजस्सम काम बन जाऊंगा।” 

दोस्त उससे कहते, “तो शुरू कर दो किसी से इश्क़।” 

मनमोहन जवाब देता, “नहीं... मैं ऐसे इश्क़ का क़ाइल नहीं जो मर्द की तरफ़ से शुरू हो।” 

दोपहर के खाने का वक़्त क़रीब आरहा था। मनमोहन ने सामने दीवार पर क्लाक की तरफ़ देखा। टेलीफ़ोन की घंटी बजना शुरू हुई। उसने रिसीवर उठाया और कहा, हेलो... फ़ोर फ़ोर फ़ोर फाईव सेवन।” 

दूसरी तरफ़ से पतली सी आवाज़ आई, “फ़ोर फ़ोर फ़ोर फाईव सेवन?” 

मनमोहन ने जवाब दिया, “जी हाँ!” 

निस्वानी आवाज़ ने पूछा, “आप कौन हैं?” 

“मनमोहन!... फ़रमाईए!” 

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई तो मनमोहन ने कहा, “फ़रमाईए किस से बात करना चाहती हैं आप?” 

आवाज़ ने जवाब दिया, “आप से!” 

मनमोहन ने ज़रा हैरत से पूछा, “मुझ से?” 

“जी हाँ... आपसे क्या आपको कोई एतराज़ है।” 

मनमोहन सटपटा सा गया, “जी... जी नहीं!” 

आवाज़ मुस्कुराई, “आपने अपना नाम मदनमोहन बताया था।” 

“जी नहीं... मनमोहन।” 

“मनमोहन?” 

चंद लम्हात ख़ामोशी में गुज़र गए तो मनमोहन ने कहा, “आप बातें करना चाहती थीं मुझ से?” 

आवाज़ आई, “जी हाँ।” 

“तो कीजिए!” 

थोड़े वक़फ़े के बाद आवाज़ आई, “समझ में नहीं आता क्या बात करूं... आप ही शुरू कीजिए न कोई बात।” 

“बहुत बेहतर,” ये कह कर मनमोहन ने थोड़ी देर सोचा, “नाम अपना बता चुका हूँ। आरिज़ी तौर पर ठिकाना मेरा ये दफ़्तर है... पहले फुटपाथ पर सोता था। अब एक हफ़्ता से इस दफ़्तर के बड़े मेज़ पर सोता हूँ।” 

आवाज़ मुस्कुराई, “फुटपाथ पर आप मसहरी लगा कर सोते थे?” 

मनमोहन हंसा, “इससे पहले कि मैं आपसे मज़ीद गुफ़्तगु करूं। मैं ये बात वाज़ेह करदेना चाहता हूँ कि मैंने कभी झूट नहीं बोला। फुटपाथों पर सोते मुझे एक ज़माना हो गया है, ये दफ़्तर तक़रीबन एक हफ़्ते से मेरे क़ब्ज़े में है। आजकल ऐश कर रहा हूँ।” 

आवाज़ मुस्कुराई, “कैसे ऐश?” 

मनमोहन ने जवाब दिया, “एक किताब मिल गई थी यहां से... आख़िरी औराक़ गुम हैं लेकिन मैं इसे बीस मर्तबा पढ़ चुका हूँ... सालिम किताब कभी हाथ लगी तो मालूम होगा हीरो-हीरोइन के इश्क़ का अंजाम क्या हुआ?” 

आवाज़ हंसी, “आप बड़े दिलचस्प आदमी हैं।” 

मनमोहन ने तकल्लुफ़ से कहा, “आप की ज़र्रा नवाज़ी है।” 

आवाज़ ने थोड़े तवक्कुफ़ के बाद पूछा, “आप का शग़्ल क्या है?” 

“शग़ल?” 

“मेरा मतलब है आप करते क्या हैं?” 

“क्या करता हूँ... कुछ भी नहीं। एक बेकार इंसान क्या कर सकता है। सार दिन आवारागर्दी करता हूँ, रात को सो जाता हूँ।” 

आवाज़ ने पूछा, “ये ज़िंदगी आपको अच्छी लगती है।” 

मनमोहन सोचने लगा, “ठहरिए... बात दरअसल ये है कि मैंने इस पर कभी ग़ौर ही नहीं किया। अब आपने पूछा है तो मैं अपने आप से पूछ रहा हूँ कि ये ज़िंदगी तुम्हें अच्छी लगती है या नहीं?” 

“कोई जवाब मिला?” 

थोड़े वक़्फ़े के बाद मनमोहन ने जवाब दिया, “जी नहीं... लेकिन मेरा ख़याल है कि ऐसी ज़िंदगी मुझे अच्छी लगती ही होगी। जब कि एक अर्से से बसर कर रहा हूँ।” 

आवाज़ हंसी। मनमोहन ने कहा, “आप की हंसी बड़ी मुतरन्निम है।” 

आवाज़ शर्मा गई, “शुक्रिया!” और सिलसिल-ए-गुफ़्तुगू मुनक़ते कर दिया। 

मनमोहन थोड़ी देर रिसीवर हाथ में लिए खड़ा रहा। फिर मुस्कुरा कर उसे रख दिया और दफ़्तर बंद करके चला गया। 

दूसरे रोज़ सुबह आठ बजे जबकि मनमोहन दफ़्तर के बड़े मेज़ पर सो रहा था, टेलीफ़ोन की घंटी बजना शुरू हुई। जमाईयाँ लेते हुए उसने रिसीवर उठाया और कहा,“हलो, फ़ोर फ़ोर फ़ोर फाईव सेवन।” 

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, “आदाब अर्ज़ मनमोहन साहब!” 

“आदाब अर्ज़!” मनमोहन एक दम चौंका, “ओह, आप... आदाब अर्ज़।” 

“तस्लीमात!” 

आवाज़ आई, “आप ग़ालिबन सो रहे थे?” 

“जी हाँ, यहां आकर मेरी आदात कुछ बिगड़ रही हैं। वापस फुटपाथ पर गया तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी।” 

आवाज़ मुस्कुराई, “क्यों?” 

“वहां सुबह पाँच बजे से पहले पहले उठना पड़ता है।” 

आवाज़ हंसी, मनमोहन ने पूछा, “कल आप ने एक दम टेलीफ़ोन बंद कर दिया।” 

आवाज़ शर्माई, “आप ने मेरी हंसी की तारीफ़ क्यों की थी।” 

मनमोहन ने कहा, “लो साहब, ये भी अजीब बात कही आप ने... कोई चीज़ जो ख़ूबसूरत हो तो उसकी तारीफ़ नहीं करनी चाहिए?” 

“बिल्कुल नहीं!” 

“ये शर्त आप मुझ पर आइद नहीं कर सकतीं... मैंने आज तक कोई शर्त अपने ऊपर आइद नहीं होने दी। आप हंसेंगी तो मैं ज़रूर तारीफ़ करूंगा।” 

“मैं टेलीफ़ोन बंद कर दूँगी।” 

“बड़े शौक़ से।” 

“आपको मेरी नाराज़गी का कोई ख़याल नहीं।” 

“मैं सबसे पहले अपने आपको नाराज़ नहीं करना चाहता... अगर मैं आपकी हंसी की तारीफ़ न करूं तो मेरा ज़ौक़ मुझ से नाराज़ हो जाएगा... ये ज़ौक़ मुझे बहुत अज़ीज़ है!” 

थोड़ी देर ख़ामोशी रही। उसके बाद दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, “माफ़ कीजिएगा, मैं मुलाज़िमा से कुछ कह रही थी... आपका ज़ौक़ आपको बहुत अज़ीज़ है... हाँ ये तो बताईए आपको शौक़ किस चीज़ का है?” 

“क्या मतलब?” 

“यानी... कोई शग़्ल... कोई काम... मेरा मतलब है, आपको आता क्या है?” 

मनमोहन हंसा, “कोई काम नहीं आता... फोटोग्राफी का थोड़ा सा शौक़ है।” 

“ये बहुत अच्छा शौक़ है।” 

“इसकी अच्छाई या बुराई का मैंने कभी नहीं सोचा।” 

आवाज़ ने पूछा, “कैमरा तो आपके पास बहुत अच्छा होगा?” 

मनमोहन हंसा, “मेरे पास अपना कोई कैमरा नहीं। दोस्त से मांग कर शौक़ पूरा कर लेता हूँ। अगर मैंने कभी कुछ कमाया तो एक कैमरा मेरी नज़र में है, वो खरीदूंगा।” 

आवाज़ ने पूछा, “कौन सा कैमरा?” 

मनमोहन ने जवाब दिया, “एग्ज़क्टा, रेफ़लेक्स कैमरा है। मुझे बहुत पसंद है।” 

थोड़ी देर ख़ामोशी रही। उसके बाद आवाज़ आई, “मैं कुछ सोच रही थी।” 

“क्या?” 

“आपने मेरा नाम पूछा न टेलीफ़ोन नंबर दरयाफ़्त किया।” 

“मुझे इसकी ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई?” 

“क्यों?” 

“नाम आपका कुछ भी हो, क्या फ़र्क़ पड़ता है... आपको मेरा नंबर मालूम है बस ठीक है... आप अगर चाहेंगी तो मैं आपको टेलीफ़ोन करूं तो नाम और नंबर बता दीजिएगा।” 

“मैं नहीं बताऊंगी।” 

“लो साहब, ये भी ख़ूब रहा... मैं जब आप से पूछूंगा ही नहीं तो बताने न बताने का सवाल ही कहाँ पैदा होता है।” 

आवाज़ मुस्कुराई, “आप अजीब-ओ-ग़रीब आदमी हैं।” 

मनमोहन मुस्कुरा दिया, “जी हाँ, कुछ ऐसा ही आदमी हूँ।” 

चंद सेकंड ख़ामोशी रही, “आप फिर सोचने लगीं।” 

“जी हाँ, कोई और बात इस वक़्त सूझ नहीं रही थी।” 

“तो टेलीफ़ोन बंद कर दीजिए... फिर सही।” 

आवाज़ किसी क़दर तीखी होगई, “आप बहुत रूखे आदमी हैं... टेलीफ़ोन बंद कर दीजिए। लीजिए में बंद करती हूँ।” 

मनमोहन ने रिसीवर रख दिया और मुस्कराने लगा। 

आधे घंटे के बाद जब मनमोहन हाथ धो कर कपड़े पहन कर बाहर निकलने के लिए तैयार हुआ तो टेलीफ़ोन की घंटी बजी। उसने रिसीवर उठाया और कहा, “फ़ोर फ़ोर फ़ोर फाईव सेवन!” 

आवाज़ आई, “मिस्टर मनमोहन?” 

मनमोहन ने जवाब दिया, “जी हाँ मनमोहन, इरशाद?” 

आवाज़ मुस्कुराई, “इरशाद ये है कि मेरी नाराज़गी दूर होगई है।” 

मनमोहन ने बड़ी शगुफ़्तगी से कहा, “मुझे बड़ी ख़ुशी हुई है।” 

“नाश्ता करते हुए मुझे ख़याल आया कि आपके साथ बिगाड़नी नहीं चाहिए... हाँ आपने नाश्ता कर लिया।” 

“जी नहीं बाहर निकलने ही वाला था कि आपने टेलीफ़ोन किया।” 

“ओह... तो आप जाईए।” 

“जी नहीं, मुझे कोई जल्दी नहीं, मेरे पास आज पैसे नहीं हैं। इसलिए मेरा ख़याल है कि आज नाश्ता नहीं होगा।” 

“आपकी बातें सुन कर... आप ऐसी बातें क्यों करते हैं... मेरा मतलब है ऐसी बातें आप इसलिए करते हैं कि आपको दुख होता है?” 

मनमोहन ने एक लम्हा सोचा, “जी नहीं... मेरा अगर कोई दुख दर्द है तो मैं उसका आदी हो चुका हूँ।” 

आवाज़ ने पूछा, “मैं कुछ रुपये आपको भेज दूं?” 

मनमोहन ने जवाब दिया, “भेज दीजिए। मेरे फेनान्सरों में एक आपका भी इज़ाफ़ा हो जाएगा!” 

“नहीं मैं नहीं भेजूंगी!” 

“आपकी मर्ज़ी!” 

“मैं टेलीफ़ोन बंद करती हूँ।” 

“बेहतर।” 

मनमोहन ने रिसीवर रख दिया और मुस्कुराता हुआ दफ़्तर से निकल गया। रात को दस बजे के क़रीब वापस आया और कपड़े बदल कर मेज़ पर लेट कर सोचने लगा कि ये कौन है जो उसे फ़ोन करती है, आवाज़ से सिर्फ़ इतना पता चलता था कि जवान है। हंसी बहुत ही मुतरन्निम थी। गुफ़्तगु से ये साफ़ ज़ाहिर है कि तालीम याफ़्ता और मोहज़्ज़ब है। बहुत देर तक वो उसके मुतअल्लिक़ सोचता रहा। इधर क्लाक ने ग्यारह बजाये उधर टेलीफ़ोन की घंटी बजी। 

मनमोहन ने रिसीवर उठाया, “हलो।” 

दूसरी तरफ़ से वही आवाज़ आई, “मिस्टर मनमोहन।” 

“जी हाँ... मनमोहन... इरशाद।” 

“इरशाद ये है कि मैंने आज दिन में कई मर्तबा रिंग किया। आप कहाँ ग़ायब थे?” 

“साहब बेकार हूँ, लेकिन फिर भी काम पर जाता हूँ।” 

“किस काम पर?” 

“आवारागर्दी।” 

“वापस कब आए?” 

“दस बजे।” 

“अब क्या कर रहे थे?” 

“मेज़ पर लेटा आपकी आवाज़ से आपकी तस्वीर बना रहा था।” 

“बनी?” 

“जी नहीं।” 

बनाने की कोशिश न कीजिए... मैं बड़ी बदसूरत हूँ।” 

“माफ़ कीजिएगा, अगर आप वाक़ई बदसूरत हैं तो टेलीफ़ोन बंद कर दीजिए, बदसूरती से मुझे नफ़रत है।” 

आवाज़ मुस्कुराई, “ऐसा है तो चलिए मैं ख़ूबसूरत हूँ, मैं आपके दिल में नफ़रत नहीं पैदा करना चाहती।” 

थोड़ी देर ख़ामोशी रही। मनमोहन ने पूछा, “कुछ सोचने लगीं?” 

आवाज़ चौंकी, “जी नहीं... मैं आप से पूछने वाली थी कि...” 

“सोच लीजिए अच्छी तरह।” 

आवाज़ हंस पड़ी, “आपको गाना सुनाऊं?” 

“ज़रूर।” 

“ठहरिए।” 

गला साफ़ करने की आवाज़ आई। फिर ग़ालिब की ये ग़ज़ल शुरू हुई, “नुक्ता चीं है ग़म-ए-दिल...” 

सहगल वाली नई धुन थी। आवाज़ में दर्द और ख़ुलूस था। जब ग़ज़ल ख़त्म हुई तो मनमोहन ने दाद दी, “बहुत ख़ूब... ज़िंदा रहो।” 

आवाज़ शर्मा गई, “शुक्रिया...” और टेलीफ़ोन बंद कर दिया। 

दफ़्तर के बड़े मेज़ पर मनमोहन के दिल-ओ-दिमाग़ में सारी रात ग़ालिब की ग़ज़ल गूंजती रही। सुबह जल्दी उठा और टेलीफ़ोन का इंतिज़ार करने लगे। तक़रीबन ढाई घंटे कुर्सी पर बैठा रहा मगर टेलीफ़ोन की घंटी न बजी। जब मायूस हो गया तो एक अजीब सी तल्ख़ी उसने अपने हलक़ में महसूस की, उठ कर टहलने लगा। उसके बाद मेज़ पर लेट गया और कुढ़ने लगा। वही किताब जिसको वो मुतअद्दिद मर्तबा पढ़ चुका था उठाई और वर्क़ गर्दानी शुरू करदी। यूंही लेटे लेटे शाम होगई। तक़रीबन सात बजे टेलीफ़ोन की घंटी बजी। मनमोहन ने रिसीवर उठाया और तेज़ी से पूछा, “कौन है?” 

वही आवाज़ आई, “मैं!” 

मनमोहन का लहजा तेज़ रहा, “इतनी देर तुम कहाँ थीं?” 

आवाज़ लरज़ी, “क्यों?” 

“मैं सुबह से यहां झक मार रहा हूँ... नाश्ता किया है न दोपहर का खाना खाया है हालाँकि मेरे पास पैसे मौजूद थे।” 

आवाज़ आई, “मेरी जब मर्ज़ी होगी टेलीफ़ोन करूंगी... आप...” 

मनमोहन ने बात काट कर कहा, “देखो जी ये सिलसिला बंद करो। टेलीफ़ोन करना है तो एक वक़्त मुक़र्रर करो। मुझसे इंतिज़ार बर्दाश्त नहीं होता। 

आवाज़ मुस्कुराई, “आज की माफ़ी चाहती हूँ। कल से बाक़ायदा सुबह और शाम फ़ोन आया करेगा आपको। 

“ये ठीक है!” 

आवाज़ हंसी, “मुझे मालूम नहीं था आप इस क़दर बिगड़े दिल हैं।” 

मनमोहन मुस्कुराया, “माफ़ करना। इंतिज़ार से मुझे बहुत कोफ़्त होती है और जब मुझे किसी बात से कोफ़्त होती है तो अपने आपको सज़ा देना शुरू कर देता हूँ।” 

“वो कैसे?” 

“सुबह तुम्हारा टेलीफ़ोन न आया... चाहिए तो ये था कि मैं चला जाता... लेकिन बैठा दिन भर अंदर ही अंदर कुढ़ता रहा। बचपना है साफ़।” 

आवाज़ हमदर्दी में डूब गई, “काश मुझसे ये ग़लती न होती... मैंने क़सदन सुबह टेलीफ़ोन न किया!” 

“क्यों?” 

“ये मालूम करने के लिए आप इंतिज़ार करेंगे या नहीं?” 

मनमोहन हंसा, “बहुत शरीर हो तुम... अच्छा अब टेलीफ़ोन बंद करो। मैं खाना खाने जा रहा हूँ।” 

“बेहतर, कब तक लौटियेगा?” 

“आधे घंटे तक।” 

मनमोहन आधे घंटे के बाद खाना खा कर लौटा तो उसने फ़ोन किया। देर तक दोनों बातें करते रहे। उसके बाद उसने ग़ालिब की एक ग़ज़ल सुनाई। मनमोहन ने दिल से दाद दी। फिर टेलीफ़ोन का सिलसिला मुनक़ता हो गया।

अब हर रोज़ सुबह और शाम मनमोहन को उसका टेलीफ़ोन आता। घंटी की आवाज़ सुनते ही वो टेलीफ़ोन की तरफ़ लपकता। बा'ज़ औक़ात घंटों बातें जारी रहतीं। इस दौरान में मनमोहन ने उससे टेलीफ़ोन का नंबर पूछा न उसका नाम। शुरू शुरू में उसने उसकी आवाज़ की मदद से तख़य्युल के पर्दे पर उसकी तस्वीर खींचने की कोशिश की थी। मगर अब वो जैसे आवाज़ ही से मुतमइन होगया था। आवाज़ ही शक्ल थी, आवाज़ ही सूरत थी। आवाज़ ही जिस्म था, आवाज़ ही रूह थी। 

एक दिन उसने पूछा, “मोहन, तुम मेरा नाम क्यों नहीं पूछते?” 

मनमोहन ने मुस्कुरा कर कहा, “तुम्हारा नाम तुम्हारी आवाज़ है।” 

“जो कि बहुत मुतरन्निम है।” 

“इसमें क्या शक है?” 

एक दिन वो बड़ा टेढ़ा सवाल कर बैठी, “मोहन तुमने कभी किसी लड़की से मोहब्बत की है?” 

मनमोहन ने जवाब दिया, “नहीं।” 

“क्यों?” 

मोहन एक दम उदास होगया, “इस क्यों का जवाब चंद लफ़्ज़ों में नहीं दे सकता। मुझे अपनी ज़िंदगी का सारा मलबा उठाना पड़ेगा... अगर कोई जवाब न मिले तो बड़ी कोफ़्त होगी।” 

“जाने दीजिए।” 

टेलीफ़ोन का रिश्ता क़ायम हुए तक़रीबन एक महीना होगया। बिला नागा दिन में दो मर्तबा उसका फ़ोन आता। मनमोहन को अपने दोस्त का ख़त आया कि कर्जे़ का बंदोबस्त होगया है। सात-आठ रोज़ में वो बंबई पहुंचने वाला है। मनमोहन ये ख़त पढ़ कर अफ़्सुर्दा हो गया। उसका टेलीफ़ोन आया तो मनमोहन ने उससे कहा, मेरी दफ़्तर की बादशाही अब चंद दिनों की मेहमान है। 

उसने पूछा, “क्यों?” 

मनमोहन ने जवाब दिया, “कर्जे़ का बंदोबस्त होगया है... दफ़्तर आबाद होने वाला है।” 

“तुम्हारे किसी और दोस्त के घर में टेलीफ़ोन नहीं।” 

“कई दोस्त हैं जिनके टेलीफ़ोन हैं, मगर मैं तुम्हें उनका नंबर नहीं दे सकता।” 

“क्यों?” 

“मैं नहीं चाहता तुम्हारी आवाज़ कोई और सुने।” 

“वजह?” 

“मैं बहुत हासिद हूँ।” 

वो मुस्कुराई, “ये तो बड़ी मुसीबत हुई।” 

“क्या किया जाये?” 

आख़िरी दिन जब तुम्हारी बादशाहत ख़त्म होने वाली होगी, मैं तुम्हें अपना नंबर दूंगी।” 

“ये ठीक है!” 

मनमोहन की सारी अफ़्सुर्दगी दूर होगई। वो उस दिन का इंतिज़ार करने लगा कि दफ़्तर में उसकी बादशाहत ख़त्म हो। अब फिर उसने उसकी आवाज़ की मदद से अपने तख़य्युल के पर्दे पर उसकी तस्वीर खींचने की कोशिश शुरू की। कई तस्वीरें बनीं मगर वो मुत्मइन न हुआ। उसने सोचा चंद दिनों की बात है। उसने टेलीफ़ोन नंबर बता दिया तो वो उसे देख भी सकेगा। इसका ख़याल आते ही उसका दिल-ओ-दिमाग़ सुन्न हो जाता, “मेरी ज़िंदगी का वो लम्हा कितना बड़ा लम्हा होगा जब मैं उसको देखूंगा।” 

दूसरे रोज़ जब उसका टेलीफ़ोन आया तो मनमोहन ने उससे कहा, “तुम्हें देखने का इश्तियाक़ पैदा हो गया है।” 

“क्यों?” 

“तुम ने कहा था कि आख़िरी दिन जब यहां मेरी बादशाहत ख़त्म होने वाली होगी तो तुम मुझे अपना नंबर बता दोगी।” 

“कहा था।” 

“इसका ये मतलब है तुम मुझे अपना एड्रेस दे दोगी... मैं तुम्हें देख सकूँगा।” 

“तुम मुझे जब चाहो देख सकते हो... आज ही देख लो।” 

“नहीं नहीं...” फिर कुछ सोच कर कहा, “मैं ज़रा अच्छे लिबास में तुम से मिलना चाहता हूँ... आज ही एक दोस्त से कह रहा हूँ, वो मुझे सूट दिलवा देगा।” 

वो हंस पड़ी, “बिल्कुल बच्चे हो तुम... सुनो। जब तुम मुझसे मिलोगे तो मैं तुम्हें एक तोहफ़ा दूंगी।” 

मनमोहन ने जज़्बाती अंदाज़ में कहा, “तुम्हारी मुलाक़ात से बढ़ कर और क्या तोहफ़ा हो सकता है?” 

“मैंने तुम्हारे लिए एग्ज़ेक्टा कैमरा ख़रीद लिया है।” 

“ओह!” 

“इस शर्त पर दूंगी कि पहले मेरा फ़ोटो उतारो।” 

मनमोहन मुस्कुराया, “इस शर्त का फ़ैसला मुलाक़ात पर करूंगा।” 

थोड़ी देर और गुफ़्तगु हुई उसके बाद उधर से वो बोली, “मैं कल और परसों तुम्हें टेलीफ़ोन नहीं कर सकूंगी।” 

मनमोहन ने तशवीश भरे लहजे में पूछा, “क्यों?” 

“मैं अपने अज़ीज़ों के साथ कहीं बाहर जा रही हूँ। सिर्फ़ दो दिन ग़ैर हाज़िर रहूंगी। मुझे माफ़ कर देना।” 

ये सुनने के बाद मनमोहन सारा दिन दफ़्तर ही में रहा। दूसरे दिन सुबह उठा तो उसने हरारत महसूस की। सोचा कि ये इज़मेह्लाल शायद इसलिए है कि उसका टेलीफ़ोन नहीं आएगा लेकिन दोपहर तक हरारत तेज़ हो गई। बदन तपने लगा। आँखों से शरारे फूटने लगे। मनमोहन मेज़ पर लेट गया। प्यास बार बार सताती थी। उठता और नल से मुँह लगा कर पानी पीता। शाम के क़रीब उसे अपने सीने पर बोझ महसूस होने लगा। दूसरे रोज़ वो बिल्कुल निढाल था। सांस बड़ी दिक़्क़त से आता था। सीने की दुखन बहुत बढ़ गई थी। 

कई बार उस पर हिज़यानी कैफ़ियत तारी हुई। बुख़ार की शिद्दत में वो घंटों टेलीफ़ोन पर अपनी महबूब आवाज़ के साथ बातें करता रहा। शाम को उसकी हालत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई। धुंदलाई हुई आँखों से उसने क्लाक की तरफ़ देखा, उसके कानों में अजीब-ओ-ग़रीब आवाज़ें गूंज रही थीं। जैसे हज़ारहा टेलीफ़ोन बोल रहे हैं, सीने में घुंघरू बज रहे थे। चारों तरफ़ आवाज़ें ही आवाज़ें थीं। चुनांचे जब टेलीफ़ोन की घंटी बजी तो उसके कानों तक उसकी आवाज़ न पहुंची। बहुत देर तक घंटी बजती रही। एक दम मनमोहन चौंका। उसके कान अब सुन रहे थे। लड़खड़ाता हुआ उठा और टेलीफ़ोन तक गया। दीवार का सहारा ले कर उसने काँपते हुए हाथों से रिसीवर उठाया और ख़ुश्क होंटों पर लड़की जैसी ज़बान फेर कर कहा, “हलो।” 

दूसरी तरफ़ से वो लड़की बोली, “हलो... मोहन?” 

मनमोहन की आवाज़ लड़खड़ाई, “हाँ मोहन!” 

“ज़रा ऊंची बोलो...” 

मनमोहन ने कुछ कहना चाहा, मगर वो उसके हलक़ ही में ख़ुश्क हो गया। 

आवाज़ आई, “मैं जल्दी आगई... बड़ी देर से तुम्हें रिंग कर रही हूँ... कहाँ थे तुम?” 

मनमोहन का सर घूमने लगा। 

आवाज़ आई क्या हो गया है, “तुम्हें?” 

मनमोहन ने बड़ी मुश्किल से इतना कहा, “मेरी बादशाहत ख़त्म हो गई है आज।” 

उसके मुँह से ख़ून निकला और एक पतली लकीर की सूरत में गर्दन तक दौड़ता चला गया। 

आवाज़ आई, “मेरा नंबर नोट करलो... फाइव नॉट थ्री वन फ़ोर, फ़ाइव नॉट थ्री वन फ़ोर... सुबह फ़ोन करना।” ये कह कर उसने रिसीवर रख दिया। मनमोहन औंधे मुँह टेलीफ़ोन पर गिरा... उसके मुँह से ख़ून के बुलबुले फूटने लगे। 


Tuesday, August 17, 2021

आर्टिस्ट लोग

स्टोरीलाइन

इस कहानी में आर्टिस्ट की ज़िंदगी की पीड़ा को बयान किया गया है। जमीला और महमूद अपनी कला के वुजूद के लिए कई तरह के जतन करते हैं लेकिन कला प्रेमियों की कमी के कारण कला का संरक्षण मुश्किल महसूस होने लगता है। हालात से परेशान हो कर आर्थिक निश्चिंतता के लिए वे एक फैक्ट्री में काम करने लगते हैं, लेकिन दोनों को यह काम कलाकार के प्रतिष्ठा के अनुकूल महसूस नहीं होता इसीलिए दोनों एक दूसरे से अपनी इस मजबूरी और काम को छुपाते हैं।


जमीला को पहली बार महमूद ने बाग़-ए-जिन्ना में देखा। वो अपनी दो सहेलियों के साथ चहल क़दमी कर रही थी। सबने काले बुर्के पहने थे। मगर नक़ाबें उलटी हुई थीं। महमूद सोचने लगा। ये किस क़िस्म का पर्दा है कि बुर्क़ा ओढ़ा हुआ है, मगर चेहरा नंगा है। आख़िर इस पर्दे का मतलब क्या? महमूद जमीला के हुस्न से बहुत मुतास्सिर हुआ। 


वो अपनी सहेलियों के साथ हंसती खेलती जा रही थी। महमूद उसके पीछे चलने लगा... उसको इस बात का क़तअन होश नहीं था कि वो एक ग़ैर अख़लाक़ी हरकत का मुर्तकिब हो रहा है। उसने सैंकड़ों मर्तबा जमीला को घूर घूर के देखा। इसके इलावा एक दो बार उसको अपनी आँखों से इशारे भी किए। मगर जमीला ने उसे दर-ख़ूर ऐतिना न समझा और अपनी सहेलियों के साथ बढ़ती चली गई। 

उसकी सहेलियां भी काफ़ी ख़ूबसूरत थीं। मगर महमूद ने उसमें एक ऐसी कशिश पाई जो लोहे के साथ मक़्नातीस की होती है... वो उसके साथ चिमट कर रह गया। 

एक जगह उसने जुर्रत से काम लेकर जमीला से कहा, “हुज़ूर अपना नक़ाब तो संभालिए, हवा में उड़ रहा है।” 

जमीला ने ये सुन कर शोर मचाना शुरू कर दिया। इस पर पुलिस के दो सिपाही जो उस वक़्त बाग़ में ड्यूटी पर थे, दौड़ते आए और जमीला से पूछा, “बहन क्या बात है?” 

जमीला ने महमूद की तरफ़ देखा जो सहमा खड़ा था और कहा, “ये लड़का मुझसे छेड़ख़ानी कर रहा था, जबसे मैं इस बाग़ में दाख़िल हुई हूँ, ये मेरा पीछा कर रहा है।” 

सिपाहियों ने महमूद का सरसरी जायज़ा लिया और उसको गिरफ़्तार कर के हवालात में दाख़िल कर दिया... लेकिन उसकी ज़मानत हो गई। 

अब मुक़द्दमा शुरू हुआ... उसकी रूएदाद में जाने की ज़रूरत नहीं। इसलिए कि ये तफ़्सील तलब है... क़िस्सा मुख़्तसर ये है कि महमूद का जुर्म साबित हो गया और उसे दो माह क़ैद बा-मुशक़्क़त की सज़ा मिल गई। 

उसके वालिदैन नादार थे। इसलिए वो सेशन की अदालत में अपील न कर सके। महमूद सख़्त परेशान था कि आख़िर उसका क़ुसूर क्या है। उसको अगर एक लड़की पसंद आ गई थी और उसने उससे चंद बातें करना चाहीं तो ये क्या जुर्म है, जिसकी पादाश में वो दो माह क़ैद बा-मुशक़्क़त भुगत रहा है। 

जेलख़ाने में वो कई मर्तबा बच्चों की तरह रोया... उसको मुसव्विरी का शौक़ था, लेकिन उससे वहां चक्की पिसवाई जाती थी। 

अभी उसे जेल ख़ाने में आए बीस रोज़ ही हुए थे कि उसे बताया गया कि उसकी मुलाक़ात आई है... महमूद ने सोचा कि ये मुलाक़ाती कौन है? उसके वालिद तो उससे सख़्त नाराज़ थे। वालिदा अपाहिज थीं और कोई रिश्तेदार भी नहीं थे। 

सिपाही उसे दरवाज़े के पास ले गया जो आहनी सलाखों का बना हुआ था। उन सलाखों के पीछे उसने देखा कि जमीला खड़ी है... वो बहुत हैरत-ज़दा हुआ। उसने समझा कि शायद किसी और को देखने आई होगी। मगर जमीला ने सलाखों के पास आकर उससे कहा, “मैं आपसे मिलने आई हूँ।”
महमूद की हैरत में और भी इज़ाफ़ा होगया, “मुझसे...” 

“जी हाँ... मैं माफ़ी मांगने आई हूँ कि मैंने जल्दबाज़ी की, जिसकी वजह से आपको यहां आना पड़ा।” 

महमूद मुस्कुराया, “हाय इस ज़ूद-ए-पशेमाँ का पशेमाँ होना।” 

जमीला ने कहा, “ये ग़ालिब है?” 

“जी हाँ, ग़ालिब के सिवा और कौन हो सकता है जो इंसान के जज़्बात की तर्जुमानी कर सके... मैंने आपको माफ़ कर दिया, लेकिन मैं यहां आपकी कोई ख़िदमत नहीं कर सकता। इसलिए कि ये मेरा घर नहीं है सरकार का है... इसके लिए मैंमाफ़ी का ख़्वास्तगार हूँ।” 

“जमीला की आँखों में आँसू आ गए, “मैं आपकी ख़ादिमा हूँ।” 

चंद मिनट उनके दरमियान और बातें हुईं, जो मुहब्बत के अह्द-ओ-पैमान थीं... जमीला ने उसको साबुन की एक टिकिया दी, मिठाई भी पेश की। इसके बाद वो हर पंद्रह दिन के बाद महमूद से मुलाक़ात करने के लिए आती रही। इस दौरान में इन दोनों की मुहब्बत उस्तवार होगई। 

जमीला ने महमूद को एक रोज़ बताया, “मुझे मौसीक़ी सीखने का शौक़ है... आजकल मैं ख़ां साहब सलाम अली ख़ां से सबक़ ले रही हूँ।” 

महमूद ने उससे कहा, “मुझे मुसव्विरी का शौक़ है, मुझे यहां जेलख़ाने में और कोई तकलीफ़ नहीं... मशक़्क़त से में घबराता नहीं। लेकिन मेरी तबीयत जिस फ़न की तरफ़ माएल है उसकी तस्कीन नहीं होती। यहां कोई रंग है न रोगन है। कोई काग़ज़ है न पैंसिल... बस चक्की पीसते रहो।” 

जमीला की आँखें फिर आँसू बहाने लगीं, “बस अब थोड़े ही दिन बाक़ी रह गए हैं। आप बाहर आएं तो सब कुछ हो जाएगा।” 

महमूद दो माह की क़ैद काटने के बाद बाहर आया तो जमीला दरवाज़े पर मौजूद थी... उस काले बुर्के में जो अब भूसला होगया था और जगह जगह से फटा हुआ था। 

दोनों आर्टिस्ट थे। इसलिए उन्होंने फ़ैसला किया कि शादी कर लें... चुनांचे शादी होगई। जमीला के माँ-बाप कुछ असासा छोड़ गए थे, उससे उन्होंने एक छोटा सा मकान बनाया और पुर मसर्रत ज़िंदगी बसर करने लगे। 

महमूद एक आर्ट स्टूडियो में जाने लगा ताकि अपनी मुसव्विरी का शौक़ पूरा करे... जमीला ख़ां साहब सलाम अली ख़ां से फिर तालीम हासिल करने लगी। 

एक बरस तक वो दोनों तालीम हासिल करते रहे। महमूद मुसव्विरी सीखता रहा और जमीला मौसीक़ी। उसके बाद सारा असासा ख़त्म होगया और नौबत फ़ाक़ों पर आगई। लेकिन दोनों आर्ट शैदाई थे। वो समझते थे कि फ़ाक़े करने वाले ही सही तौर पर अपने आर्ट की मेराज तक पहुंच सकते हैं। इसलिए वो अपनी इस मुफ़लिसी के ज़माने में भी ख़ुश थे। 

एक दिन जमीला ने अपने शौहर को ये मुज़्दा सुनाया कि उसे एक अमीर घराने में मौसीक़ी सिखाने की ट्युशन मिल रही है। महमूद ने ये सुन कर उससे कहा, “नहीं ट्युशन-व्युशन बकवास है... हम लोग आर्टिस्ट हैं।” 

उसकी बीवी ने बड़े प्यार के साथ कहा, “लेकिन मेरी जान गुज़ारा कैसे होगा?” 
महमूद ने अपने फूसड़े निकले हुए कोट का कालर बड़े अमीराना अंदाज़ में दुरुस्त करते हुए जवाब दिया, “आर्टिस्ट को इन फ़ुज़ूल बातों का ख़याल नहीं रखना चाहिए। हम आर्ट के लिए ज़िंदा रहते हैं... आर्ट हमारे लिए ज़िंदा नहीं रहता।” 

जमीला ये सुन कर ख़ुश हुई, “लेकिन मेरी जान आप मुसव्विरी सीख रहे हैं... आपको हर महीने फ़ीस अदा करनी पड़ती है। उसका बंदोबस्त भी तो कुछ होना चाहिए... फिर खाना-पीना है। उसका ख़र्च अलाहिदा है। 

“मैंने फ़िलहाल मुसव्विरी की तालीम लेना छोड़ दी है... जब हालात मुवाफ़िक़ होंगे तो देखा जाएगा।” 

दूसरे दिन जमीला घर आई तो इसके पर्स में पंद्रह रुपये थे जो उसने अपने ख़ाविंद के हवाले कर दिए और कहा, “मैंने आज से ट्युशन शुरू कर दी है, ये पंद्रह रुपये मुझे पेशगी मिले हैं... आप मुसव्विरी का फ़न सीखने का काम जारी रखें।” 

महमूद के मर्दाना जज़्बात को बड़ी ठेस लगी, “मैं नहीं चाहता कि तुम मुलाज़मत करो... मुलाज़मत मुझे करना चाहिए।” 

जमीला ने ख़ास अंदाज़ में कहा, “हाय... मैं आपकी ग़ैर हूँ। मैंने अगर कहीं थोड़ी देर के लिए मुलाज़मत कर ली है तो इसमें हर्ज ही क्या है... बहुत अच्छे लोग हैं। जिस लड़की को मैं मौसीक़ी की तालीम देती हूँ, बहुत प्यारी और ज़हीन है।” 

ये सुन कर महमूद ख़ामोश होगया। उसने मज़ीद गुफ़्तुगू न की। 

दूसरे हफ़्ते के बाद वो पच्चीस रुपये लेकर आया और अपनी बीवी से कहा, “मैंने आज अपनी एक तस्वीर बेची है, ख़रीदार ने उसे बहुत पसंद किया। लेकिन ख़सीस था। सिर्फ़ पच्चीस रुपये दिए। अब उम्मीद है कि मेरी तस्वीरों के लिए मार्कीट चल निकलेगी।” 

जमीला मुस्कुराई, “तो फिर काफ़ी अमीर आदमी हो जाऐंगे।” 

महमूद ने उससे कहा, “जब मेरी तस्वीरें बिकना शुरू हो जाएंगी तो मैं तुम्हें ट्युशन नहीं करने दूँगा।” 

जमीला ने अपने ख़ाविंद की टाई की गिरह दुरुस्त की और बड़े प्यार से कहा, “आप मेरे मालिक हैं जो भी हुक्म देंगे मुझे तस्लीम होगा।” 

दोनों बहुत ख़ुश थे इसलिए कि वो एक दूसरे से मुहब्बत करते थे। महमूद ने जमीला से कहा, “अब तुम कुछ फ़िक्र न करो। मेरा काम चल निकला है... चार तस्वीरें कल परसों तक बिक जाएंगी और अच्छे दाम वसूल हो जाऐंगे। फिर तुम अपनी मौसीक़ी की तालीम जारी रख सकोगी।” 

एक दिन जमीला जब शाम को घर आई तो इसके सर के बालों में धुन्की हुई रूई का गुबार इस तरह जमा था जैसे किसी अधेड़ उम्र आदमी की दाढ़ी में सफ़ेद बाल। 

महमूद ने उससे इस्तिफ़सार किया, “ये तुमने अपने बालों की क्या हालत बना रखी है... मौसीक़ी सिखाने जाती हो या किसी जंग फ़ैक्ट्री में काम करती हो।” 

जमीला ने, जो महमूद की नई रज़ाई की पुरानी रूई को धुनक रही थी मुस्कुरा कर कहा, “हम आर्टिस्ट लोग हैं। हमें किसी बात का होश भी नहीं रहता...” 

महमूद ने हुक़्क़े की नय मुँह में लेकर अपनी बीवी की तरफ़ देखा और कहा, “होश वाक़ई नहीं रहता।” 

जमीला ने महमूद के बालों में अपनी उंगलियों से कंघी करना शुरू की। ये धुन्की हुई रूई का गुबार आप के सर में कैसे आगया?” महमूद ने हुक्के का एक कश लगाया, “जैसा कि तुम्हारे सर में मौजूद है... हम दोनों एक ही जंग फ़ैक्ट्री में काम करते हैं सिर्फ़ आर्ट की ख़ातिर।” 

Tuesday, August 10, 2021

1919 की एक बात

स्टोरीलाइन

आज़ादी के संघर्ष में अंग्रेज़ की गोली से शहीद होने वाले एक वेश्या के बेटे की कहानी है। तुफ़ैल उर्फ़ थैला कंजर की दो बहनें भी वेश्या थीं। तुफ़ैल एक अंग्रेज़ को मौत के घाट उतार कर ख़ुद शहीद हो गया था। अंग्रेज़ों ने बदला लेने के उद्देश्य से उसकी दोनों बहनों को बुला कर मुजरा कराया और उनकी इज़्ज़त को तार-तार किया। 



ये 1919 ई. की बात है भाई जान, जब रूल्ट ऐक्ट के ख़िलाफ़ सारे पंजाब में एजिटेशन हो रही थी। मैं अमृतसर की बात कर रहा हूँ। सर माईकल ओडवायर ने डिफ़ेंस आफ़ इंडिया रूल्ज़ के मातहत गांधी जी का दाख़िला पंजाब में बंद कर दिया था। वो इधर आ रहे थे कि पलवाल के मुक़ाम पर उनको रोक लिया गया और गिरफ़्तार कर के वापस बम्बई भेज दिया गया। जहां तक मैं समझता हूँ भाई जान, अगर अंग्रेज़ ये ग़लती न करता तो जलियाँवाला बाग़ का हादिसा उसकी हुक्मरानी की स्याह तारीख़ में ऐसे ख़ूनीं वर्क़ का इज़ाफ़ा कभी न करता। 

क्या मुसलमान, क्या हिंदू, क्या सिख, सबके दिल में गांधी जी की बेहद इज़्ज़त थी। सब उन्हें महात्मा मानते थे। जब उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर लाहौर पहुंची तो सारा कारोबार एक दम बंद हो गया। यहां से अमृतसर वालों को मालूम हुआ, चुनांचे यूं चुटकियों में मुकम्मल हड़ताल हो गई। 

कहते हैं कि नौ अप्रैल की शाम को डाक्टर सत्यपाल और डाक्टर किचलू की जिला वतनी के अहकाम डिप्टी कमिशनर को मिल गए थे। वो उनकी तामील के लिए तैयार नहीं था। इसलिए कि उसके ख़याल के मुताबिक़ अमृतसर में किसी हैजानख़ेज बात का ख़तरा नहीं था। 

लोग पुरअम्न तरीक़े पर एहतिजाजी जलसे वग़ैरा करते थे जिनसे तशद्दुद का सवाल ही पैदा नहीं होता था। मैं अपनी आँखों देखा हाल बयान करता हूँ। नौ को रामनवमी था। जलूस निकला मगर मजाल है जो किसी ने हुक्काम की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ एक क़दम उठाया हो, लेकिन भाई जान, सर माईकल अजब औंधी खोपरी का इंसान था। 

उसने डिप्टी कमिशनर की एक न सुनी। उस पर बस यही ख़ौफ़ सवार था कि ये लीडर महात्मा गांधी के इशारे पर सामराज का तख़्ता उलटने के दर पे हैं और जो हड़तालें हो रही हैं और जल्से मुनअक़िद होते हैं उनके पस-ए-पर्दा यही साज़िश काम कर रही है। 

डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्यपाल की जिला वतनी की ख़बर आनन-फ़ानन शहर में आग की तरह फैल गई। दिल हर शख़्स का मुकद्दर था। हर वक़्त धड़का सा लगा रहता था कि कोई बहुत बड़ा हादसा बरपा होने वाला है, लेकिन भाई जान, जोश बहुत ज़्यादा था। कारोबार बंद थे। शहर क़ब्रिस्तान बना हुआ था, पर इस क़ब्रिस्तान की ख़ामोशी में भी एक शोर था। 

जब डॉ. किचलू और सत्यपाल की गिरफ़्तारी की ख़बर आई तो लोग हज़ारों की तादाद में इकट्ठे हुए कि मिल कर डिप्टी कमिशनर बहादुर के पास जाएं और अपने महबूब लीडरों की जिला वतनी के अहकाम मंसूख़ कराने की दरख़ास्त करें। मगर वो ज़माना भाई जान दरख़ास्तें सुनने का नहीं था। सर माईकल जैसा फ़िरऔन हाकिम-ए-आला था। उसने दरख़ास्त सुनना तो कुजा लोगों के इस इजतिमा ही को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया। 

अमृतसर... वो अमृतसर जो कभी आज़ादी की तहरीक का सबसे बड़ा मर्कज़ था जिसके सीने पर जलियाँवाला बाग़ जैसा क़ाबिल-ए-फ़ख़्र ज़ख़्म था। आज किस हालत में है? लेकिन छोड़ीए इस क़िस्से को। दिल को बहुत दुख होता है। लोग कहते हैं कि इस मुक़द्दस शहर में जो कुछ आज से पाँच बरस पहले हुआ उसके ज़िम्मेदार भी अंग्रेज़ हैं। होगा भाई जान, पर सच पूछिए तो इस लहू में जो वहां बहा है हमारे अपने ही हाथ रंगे हुए नज़र आते हैं। ख़ैर! 

डिप्टी कमिशनर साहब का बंगला सिविल लाईन्ज़ में था। हर बड़ा अफ़सर और हर बड़ा टोडी शहर के इस अलग थलग हिस्से में रहता था... आपने अमृतसर देखा है तो आपको मालूम होगा कि शहर और सिविल लाईन्ज़ को मिलाने वाला एक पुल है जिस पर से गुज़र कर आदमी ठंडी सड़क पर पहुंचता है। जहां हाकिमों ने अपने लिए ये अर्ज़ी जन्नत बनाई हुई थी। 

हुजूम जब हाल दरवाज़े के क़रीब पहुंचा तो मालूम हुआ कि पुल पर घोड़ सवार गोरों का पहरा है। हुजूम बिल्कुल न रूका और बढ़ता गया। भाई जान, मैं उस में शामिल था। जोश कितना था, मैं बयान नहीं कर सकता, लेकिन सब निहत्ते थे। किसी के पास एक मामूली छड़ी तक भी नहीं थी। 

असल में वो तो सिर्फ़ इस ग़रज़ से निकले थे कि इजतमाई तौर पर अपनी आवाज़ हाकिम-ए-शहर तक पहुंचाएं और उससे दरख़ास्त करें कि डाक्टर किचलू और डाक्टर सत्यपाल को ग़ैरमशरूत तौर पर रिहा करदे। हुजूम पुल की तरफ़ बढ़ता रहा। लोग क़रीब पहुंचे तो गोरों ने फ़ायर शुरू करदिए। इससे भगदड़ मच गई। वो गिनती में सिर्फ़ बीस-पच्चीस थे और हुजूम सैंकड़ों पर मुश्तमिल था, लेकिन भाई गोली की दहश्त बहुत होती है। ऐसी अफ़रातफ़री फैली कि अल अमां। कुछ गोलियों से घायल हुए और कुछ भगदड़ में ज़ख़्मी हुए। 

दाएं हाथ को गंदा नाला था। धक्का लगा तो मैं उसमें गिर पड़ा। गोलियां चलनी बंद हुईं तो मैंने उठ कर देखा। हुजूम तितर-बितर हो चुका था। ज़ख़्मी सड़क पर पड़े थे और पुल पर गोरे खड़े हंस रहे थे। भाई जान, मुझे क़तअन याद नहीं कि उस वक़्त मेरी दिमाग़ी हालत किस क़िस्म की थी। 

मेरा ख़याल है कि मेरे होश-ओ-हवास पूरी तरह सलामत नहीं थे। गंदे नाले में गिरते वक़्त तो क़तअन मुझे होश नहीं था। जब बाहर निकला तो जो हादिसा वक़ूअ पज़ीर हुआ था, उसके ख़द्द-ओ-ख़ाल आहिस्ता आहिस्ता दिमाग़ में उभरने शुरू हुए। 

दूर शोर की आवाज़ सुनाई दे रही थी जैसे बहुत से लोग ग़ुस्से में चीख़-चिल्ला रहे हैं। मैं गंदा नाला उबूर करके ज़ाहिरा पीर के तकिए से होता हुआ हाल दरवाज़े के पास पहुंचा तो देखा कि तीस-चालीस नौजवान जोश में भरे पत्थर उठा उठा कर दरवाज़े के घड़ियाल पर मार रहे हैं। उसका शीशा टूट कर सड़क पर गिरा तो एक लड़के ने बाक़ीयों से कहा, “चलो... मलिका का बुत तोड़ें!” 

दूसरे ने कहा, “नहीं यार... कोतवाली को आग लगाऐं!” 

तीसरे ने कहा, “और सारे बैंकों को भी!” 

चौथे ने उनको रोका, “ठहरो... इससे क्या फ़ायदा... चलो पुल पर उन लोगों को मारें।” 

मैंने उसको पहचान लिया। ये थैला कंजर था... नाम मोहम्मद तुफ़ैल था मगर थैला कंजर के नाम से मशहूर था। इसलिए कि एक तवाइफ़ के बतन से था। बड़ा आवारागर्द था। छोटी उम्र ही में उसको जुए और शराबनोशी की लत पड़ गई थी। 

उसकी दो बहनें शमशाद और अलमास अपने वक़्त की हसीन-तरीन तवाइफ़ें थीं। शमशाद का गला बहुत अच्छा था। उसका मुजरा सुनने के लिए रईस बड़ी बड़ी दूर से आते थे। दोनों अपने भाई के करतूतों से बहुत नालां थीं। शहर में मशहूर था कि उन्होंने एक क़िस्म का उसको आक़ कर रखा है। 

फिर भी वो किसी न किसी हीले अपनी ज़रूरियात के लिए उनसे कुछ न कुछ वसूल कर ही लेता था। वैसे वो बहुत ख़ुशपोश रहता था। अच्छा खाता था, अच्छा पीता था। बड़ा नफ़ासतपसंद था। बज़्लासंजी और लतीफ़ा गोई मिज़ाज में कूट कूट के भरी थी। मीरासियों और भांडों के सोक़यानापन से बहुत दूर रहता था। लंबा क़द, भरे भरे हाथ-पांव, मज़बूत कसरती बदन। नाक-नक़्शे का भी ख़ासा था। 

पुरजोश लड़कों ने उसकी बात न सुनी और मलिका के बुत की तरफ़ चलने लगे। उसने फिर उनसे कहा, “मैंने कहा मत ज़ाए करो अपना जोश। इधर आओ मेरे साथ... चलो उनको मारें जिन्होंने हमारे बेक़सूर आदमियों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है... ख़ुदा की क़सम हम सब मिल कर उनकी गर्दन मरोड़ सकते हैं... चलो!” 

कुछ रवाना हो चुके थे, बाक़ी रुक गए। थैला पुल की तरफ़ बढ़ा तो उसके पीछे चलने लगे। मैंने सोचा कि माओं के ये लाल बेकार मौत के मुँह में जा रहे हैं। फव्वारे के पास दुबका खड़ा था। वहीं मैंने थैले को आवाज़ दी और कहा, “मत जाओ यार... क्यों अपनी और उनकी जान के पीछे पड़े हो।” 

थैले ने ये सुन कर एक अजीब सा क़हक़हा बुलंद किया और मुझ से कहा, “थैला सिर्फ़ ये बताने चला है कि वो गोलियों से डरने वाला नहीं।” फिर वो अपने साथियों से मुख़ातिब हुआ, “तुम डरते हो तो वापस जा सकते हो।” 

ऐसे मौक़ों पर बढ़े हुए क़दम उल्टे कैसे हो सकते हैं और फिर वो भी उस वक़्त जब लीडर अपनी जान हथेली पर रख कर आगे आगे जा रहा हो। थैले ने क़दम तेज़ किए तो उसके साथियों को भी करने पड़े। 

हाल दरवाज़े से पुल का फ़ासिला कुछ ज़्यादा नहीं होगा कोई... साठ-सत्तर गज़ के क़रीब... थैला सब से आगे आगे था। जहां से पुल का दो रोंया मुतवाज़ी जंगला शुरू होता है, वहां से पंद्रह-बीस क़दम के फ़ासले पर दो घुड़सवार गोरे खड़े थे। थैला नारे लगाता जब बंगले के आग़ाज़ के पास पहुंचा तो फ़ायर हुआ, मैं समझा कि वो गिर पड़ा है... लेकिन देखा कि वो उसी तरह... ज़िंदा आगे बढ़ रहा है। उसके बाक़ी साथी डर के भाग उठे हैं। मुड़ कर उसने पीछे देखा और चिल्लाया, “भागो नहीं... आओ!” 

उसका मुँह मेरी तरफ़ था कि एक और फ़ायर हुआ। पलट कर उसने गोरों की तरफ़ देखा और पीठ पर हाथ फेरा... भाई जान, नज़र तो मुझे कुछ नहीं आना चाहिए था, मगर मैंने देखा कि उसकी सफ़ेद बोसकी की क़मीज़ पर लाल लाल धब्बे थे। 

वो और तेज़ी से बढ़ा, जैसे ज़ख़्मी शेर... एक और फ़ायर हुआ। वो लड़खड़ाया मगर एक दम क़दम मज़बूत करके वो घुड़ सवार गोरे पर लपका और चश्म ज़दन में जाने क्या हुआ... घोड़े की पीठ ख़ाली थी। गोरा ज़मीन पर था और थैला उसके ऊपर... दूसरे गोरे ने जो क़रीब था और पहले बौखला गया था, बिदकते हुए घोड़े को रोका और धड़ा धड़ फ़ायर शुरू कर दिए... इसके बाद जो कुछ हुआ मुझे मालूम नहीं। मैं वहां फव्वारे के पास बेहोश हो कर गिर पड़ा। 

भाई जान, जब मुझे होश आया तो मैं अपने घर में था। चंद पहचान के आदमी मुझे वहां से उठा लाए थे। उनकी ज़बानी मालूम हुआ कि पुल पर से गोलियां खा कर हुजूम मुश्तइल होगया था। नतीजा इस इश्तिआल का ये हुआ कि मलिका के बुत को तोड़ने की कोशिश की गई। टाउन हाल और तीन बैंकों को आग लगी और पाँच या छः यूरोपीयन मारे गए। ख़ूब लूट मची। 

लूट-खसूट का अंग्रेज़ अफ़सरों को इतना ख़याल नहीं था। पाँच या छः यूरोपीयन हलाक हुए थे, उसका बदला लेने के लिए, चुनांचे जलियाँ वाला बाग़ का ख़ूनीं हादिसा रूनुमा हुआ। 

डिप्टी कमिशनर बहादुर ने शहर की बाग-डोर जनरल डायर के सपुर्द करदी। चुनांचे जनरल साहिब ने बारह अप्रैल को फ़ौजियों के साथ शहर के मुख़्तलिफ़ बाज़ारों में मार्च किया और दर्जनों बेगुनाह आदमी गिरफ़्तार किए। तेरह को जलियाँ वाला बाग़ में जलसा हुआ। क़रीब-क़रीब पच्चीस हज़ार का मजमा था। 

शाम के क़रीब जनरल डायर मुसल्लह गोरों और सिखों के साथ वहां पहुंचा और निहत्ते आदमियों पर गोलियों की बारिश शुरू कर दी। 

उस वक़्त तो किसी को नुक़्सान जान का ठीक अंदाज़ा नहीं था। बाद में जब तहक़ीक़ हुई तो पता चला कि एक हज़ार हलाक हुए हैं और तीन या चार हज़ार के क़रीब ज़ख़्मी... लेकिन मैं थैले की बात कर रहा था... भाई जान, आँखों देखी आप को बता चुका हूँ... बेऐब ज़ात ख़ुदा की है। 

मरहूम में चारों ऐब शरई थे। एक पेशा तवाइफ़ के बतन से था मगर जियाला था। मैं अब यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस मलऊन गोरे की पहली गोली भी उसके लगी थी। आवाज़ सुन कर उसने जब पलट कर अपने साथियों की तरफ़ देखा था और उन्हें हौसला दिलाया था। 

जोश की हालत में उसको मालूम नहीं हुआ था कि उसकी छाती में गर्म-गर्म सीसा उतर चुका है। दूसरी गोली उसकी पीठ में लगी। तीसरी फिर सीने में... मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो उसके दोनों हाथ उसकी गर्दन में इस बुरी तरह पैवस्त थे कि अलाहिदा नहीं होते थे... गोरा जहन्नुम वासिल हो चुका था। 

दूसरे रोज़ जब थैले की लाश कफ़न-दफ़न के लिए उसके घर वालों के सपुर्द की गई तो उसका बदन गोलियों से छलनी होरहा था। दूसरे गोरे ने तो अपना पूरा पिस्तौल उस पर ख़ाली कर दिया था। 

मेरा ख़याल है उस वक़्त मरहूम की रूह क़फ़स-ए-उंसुरी से परवाज़ कर चुकी थी। उस शैतान के बच्चे ने सिर्फ़ उसके मुर्दा जिस्म पर चांद मारी की थी। 

कहते हैं जब थैले की लाश मुहल्ले में पहुंची तो कुहराम मच गया। अपनी बिरादरी में वो इतना मक़बूल नहीं था, लेकिन उसकी क़ीमा-क़ीमा लाश देख कर सब धाड़ें मार मार कर रोने लगे। उसकी बहनें शमशाद और अलमास तो बेहोश होगईं। जब जनाज़ा उठा तो उन दोनों ने ऐसे बैन किए कि सुनने वाले लहू के आँसू रोते रहे। 

भाई जान, मैंने कहीं पढ़ा था कि फ़्रांस के इन्क़िलाब में पहली गोली वहां की एक टखयाई के लगी थी। मरहूम मुहम्मद तुफ़ैल एक तवाइफ़ का लड़का था। इन्क़िलाब की इस जद्द-ओ-जहद में उसको जो पहली गोली लगी थी दसवीं थी या पचासवीं। इसके मुताल्लिक़ किसी ने भी तहक़ीक़ नहीं की। शायद इसलिए कि सोसाइटी में इस ग़रीब का कोई रुतबा नहीं था। 

मैं तो समझता हूँ पंजाब के इस ख़ूनीं ग़ुसल में नहाने वालों की फ़हरिस्त में थैले कंजर का नाम-ओ-निशान तक भी नहीं होगा और ये भी कोई पता नहीं कि ऐसी कोई फ़हरिस्त तैयार भी हुई थी। 

सख़्त हंगामी दिन थे। फ़ौजी हुकूमत का दौर-दौरा था। वो देव जिसे मार्शल ला कहते हैं, शहर के गली-गली, कूचे-कूचे में डकारता फिरता था। बहुत अफ़रा तफ़री के आलम में उस ग़रीब को जल्दी जल्दी यूं दफ़न किया गया जैसे उसकी मौत उसके सोगवार अज़ीज़ों का एक संगीन जुर्म थी जिसके निशानात वो मिटा देना चाहते थे। 

बस भाई जान, थैला मर गया। थैला दफ़ना दिया गया और... और ये कह कर मेरा हमसफ़र पहली मर्तबा कुछ कहते-कहते रुका और ख़ामोश हो गया। 

ट्रेन दनदनाती हुई जा रही थी। पटड़ियों की खटाखट ने ये कहना शुरू कर दिया। थैला मर गया... थैला दफ़ना दिया गया... थैला मर गया ... थैला दफ़ना दिया गया। इस मरने और दफ़नाने के दरमियान कोई फ़ासला नहीं था, जैसे वो इधर मरा और उधर दफ़ना दिया गया। 

और खट-खट के साथ इन अलफ़ाज़ की हम-आहंगी कुछ इस क़दर जज़्बात से आरी थी कि मुझे अपने दिमाग़ से उन दोनों को जुदा करना पड़ा। चुनांचे मैंने अपने हम सफ़र से कहा

, “आप कुछ और भी सुनाने वाले थे?” 

चौंक कर उसने मेरी तरफ़ देखा, “जी हाँ... उस दास्तान का एक अफ़सोसनाक हिस्सा बाक़ी है।” 

मैंने पूछा, “क्या?” 

उसने कहना शुरू किया, “मैं आपसे अर्ज़ कर चुका हूँ कि थैले की दो बहनें थीं, शमशाद और अलमास। बहुत ख़ूबसूरत थीं। शमशाद लंबी थी। पतले पतले नक़्श, ग़लाफ़ी आँखें। ठुमरी बहुत ख़ूब गाती थी। सुना है ख़ां साहब फ़तह अली ख़ां से तालीम लेती रही थी। 

दूसरी अलमास थी। उसके गले में सुर नहीं था, लेकिन बतावे में अपना सानी नहीं रखती थी। मुजरा करती थी तो ऐसा लगता था कि उसका अंग-अंग बोल रहा है। हर भाव में एक घात होती थी... आँखों में वो जादू था जो हर एक के सर पर चढ़ के बोलता था।” मेरे हम सफ़र ने तारीफ़-ओ-तौसीफ में कुछ ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लिया। मगर मैंने टोकना मुनासिब न समझा। 

थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद इस लंबे चक्कर से निकला और दास्तान के अफ़सोसनाक हिस्से की तरफ़ आया, “क़िस्सा ये है भाई जान कि इन आफ़त की परकाला दो बहनों के हुस्न-ओ-जमाल का ज़िक्र किसी ख़ुशामदी ने फ़ौजी अफ़सरों से कर दिया... बलवे में एक मेम... क्या नाम था उस चुड़ैल का? मिस... मिस शरवड मारी गई थी... तय ये हुआ कि उनको बुलवाया जाये और... और... जी भर के इंतिक़ाम लिया जाये।आप समझ गए न भाई जान?” 

मैंने कहा, “जी हाँ!” 

मेरे हमसफ़र ने एक आह भरी, “ऐसे नाज़ुक मुआमलों में तवाइफ़ें और कस्बीयाँ भी अपनी माएं-बहनें होती हैं... मगर भाई जान, ये मुल्क अपनी इज़्ज़त-ओ-नामूस को मेरा ख़याल है पहचानता ही नहीं। 

जब ऊपर से इलाक़े के थानेदार को आर्डर मिला तो वो फ़ौरन तैयार हो गया। चुनांचे वो ख़ुद शमशाद और अलमास के मकान पर गया और कहा कि साहब लोगों ने याद किया है। वो तुम्हारा मुजरा सुनना चाहते हैं।भाई की क़ब्र की मिट्टी भी अभी तक ख़ुश्क नहीं हुई थी। अल्लाह को प्यारा हुए उस ग़रीब को सिर्फ़ दो दिन हुए थे कि ये हाज़िरी का हुक्म सादिर हुआ कि आओ हमारे हुज़ूर नाचो। 

अज़ियत का इससे बढ़ कर पुरअज़ियत तरीक़ा क्या हो सकता है? मुस्तबइद तमस्खुर की ऐसी मिसाल मेरा ख़याल है शायद ही कोई और मिल सके... क्या हुक्म देने वालों को इतना ख़याल भी न आया कि तवाइफ़ भी ग़ैरत मंद होती है? हो सकती है... क्यों नहीं हो सकती?” उसने अपने आपसे सवाल किया, लेकिन मुख़ातिब वो मुझ से था। 

मैंने कहा, “हो सकती है!” 

“जी हाँ”... थैला आख़िर उनका भाई था। उसने किसी क़िमारख़ाने की लड़ाई-भिड़ाई में अपनी जान नहीं दी थी। वो शराब पी कर दंगा-फ़साद करते हुए हलाक नहीं हुआ था। उसने वतन की राह में बड़े बहादुराना तरीक़े पर शहादत का जाम पिया था। वो एक तवाइफ़ के बतन से था। लेकिन वो तवाइफ़ माँ थी और शमशाद और अलमास उसी की बेटियां थीं और ये थैले की बहनें थीं... तवाइफ़ें बाद में थीं... और वो थैले की लाश देख कर बेहोश हो गई थीं। जब उसका जनाज़ा उठा था तो उन्होंने ऐसे बैन किए थे कि सुन कर आदमी लहू रोता था। 

मैंने पूछा, “वो गईं?” 

मेरे हम सफ़र ने इसका जवाब थोड़े वक़फ़े के बाद अफ़सुरदगी से दिया, “जी हाँ... जी हाँ गईं... ख़ूब सज-बन कर।” 

एक दम उसकी अफ़सुरदगी तीखापन इख़्तियार कर गई, “सोलह सिंगार करके अपने बुलाने वालों के पास गईं... कहते हैं कि ख़ूब महफ़िल जमी... दोनों बहनों ने अपने जौहर दिखाए... ज़र्क़-बर्क़ पेशवाज़ों में मलबूस वो कोह-ए-क़ाफ़ की परियां मालूम होती थीं। 

शराब के दौर चलते रहे और वो नाचती गाती रहीं। ये दोनों दौर चलते रहे और कहते हैं कि रात के दो बजे एक बड़े अफ़सर के इशारे पर महफ़िल बरख़ास्त हुई।” वो उठ खड़ा हुआ और बाहर भागते हुए दरख़्तों को देखने लगा। 

पहियों और पटड़ियों की आहनी गड़गड़ाहट की ताल पर उसके आख़िरी दो लफ़्ज़ नाचने लगे, “बरख़ास्त हुई... बरख़ास्त हुई।” 

मैंने अपने दिमाग़ में उन्हें, आहनी गड़गड़ाहट से नोच कर अलाहिदा करते हुए उससे पूछा, “फिर क्या हुआ?” 

भागते हुए दरख़्तों और खंबों से नज़रें हटा कर उसने बड़े मज़बूत लहजे में कहा, “उन्होंने अपनी ज़र्क़-बर्क़ पेशवाज़ें नोच डालीं और अलिफ़ नंगी होगईं और कहने लगीं... लो देख लो... हम थैले की बहनें हैं। उस शहीद की जिसके ख़ूबसूरत जिस्म को तुमने सिर्फ़ इसलिए अपनी गोलियों से छलनी छलनी किया था कि उसमें वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी। हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं... आओ, अपनी शहवत के गर्म-गर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो... मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुँह पर थूक लेने दो।” 

ये कह कर वो ख़ामोश हो गया, कुछ इस तरह कि और नहीं बोलेगा। मैंने फ़ौरन ही पूछा, “फिर क्या हुआ?” 

उसकी आँखों में आँसू डबडबा आए, “उनको... उनको गोली से उड़ा दिया गया।” 

मैंने कुछ न कहा। गाड़ी आहिस्ता होकर स्टेशन पर रुकी तो उसने क़ुली बुला कर अपना अस्बाब उठवाया। जब जाने लगा तो मैंने उससे कहा, “आपने जो दास्तान सुनाई, उसका अंजाम मुझे आप का ख़ुद साख़्ता मालूम होता है।” 

एक दम चौंक कर उसने मेरी तरफ़ देखा, “ये आपने कैसे जाना?” 

मैंने कहा, “आपके लहजे में एक नाक़ाबिल-ए-बयान कर्ब था।” 

मेरे हम सफ़र ने अपने हलक़ की तल्ख़ी थूक के साथ निगलते हुए कहा, “जी हाँ... उन हराम...” वो गाली देते-देते रुक गया, “उन्होंने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया।” ये कह कर वो प्लेटफार्म पर उतर गया। 

Tuesday, August 3, 2021

ब्लाउज़

 ब्लाउज़


युवावस्था के आरम्भ में शरीर में होने वाले परिवर्तनों का श्रेष्ठ वर्णन है। मोमिन एक ऐसे घर में मुलाज़िम है जिसमें शकीला और रज़िया दो खुले विचारों वाली बहनें रहती हैं। शकीला मोमिन के सामने ही ब्लाउज़ नापती, सिलती और पहन कर देखती है जिसके नतीजे में मोमिन के दिमाग़ में विभिन्न प्रकार के विचारों का हुजूम रहने लगता है और फिर एक दिन वो नए आनंद से परिचित होता है।

कुछ दिनों से मोमिन बहुत बेक़रार था। उसको ऐसा महसूस होता था कि उसका वजूद कच्चा फोड़ा सा बन गया था। काम करते वक़्त, बातें करते हुए हत्ता कि सोचने पर भी उसे एक अजीब क़िस्म का दर्द महसूस होता था। ऐसा दर्द जिसको वो बयान भी करना चाहता तो न कर सकता। 

बा'ज़ औक़ात बैठे बैठे वो एक दम चौंक पड़ता। धुन्दले धुन्दले ख़यालात जो आम हालतों में बेआवाज़ बुलबुलों की तरह पैदा हो कर मिट जाया करते हैं। मोमिन के दिमाग़ में बड़े शोर के साथ पैदा होते और शोर ही के साथ फटते थे। इसके इलावा उसके दिल-ओ-दिमाग़ के नर्म-ओ-नाज़ुक पर्दों पर हर वक़्त जैसे ख़ारदार पांव वाली च्यूंटियां सी रेंगती थीं। 

एक अजीब क़िस्म का खिंचाव उसके आज़ा में पैदा हो गया था जिसके बाइस उसे बहुत तकलीफ़ होती थी। इस तकलीफ़ की शिद्दत जब बढ़ जाती तो उसके जी में आता कि अपने आपको एक बड़े हावन में डाल दे और किसी से कहे, “मुझे कूटना शुरू कर दो।” 

बावर्चीख़ाने में गर्म मसाला कूटते वक़्त जब लोहे से लोहा टकराता और धमकों से छत में एक गूंज सी दौड़ जाती तो मोमिन के नंगे पैरों को ये लरज़िश बहुत भली मालूम होती थी। पैरों के ज़रिये से ये लरज़िश उसकी तनी हुई पिंडलियों और रानों में दौड़ती हुई उसके दिल तक पहुंच जाती, जो तेज़ हवा में रखे हुए दिये की तरह काँपना शुरू कर देता। 

मोमिन की उम्र पंद्रह बरस की थी। शायद सोलहवां भी लगा हो। उसे अपनी उम्र के मुतअल्लिक़ सही अंदाज़ा नहीं था। वो एक सेहत मंद और तंदुरुस्त लड़का था जिसका लड़कपन तेज़ क़दमी से जवानी के मैदान की तरफ़ भाग रहा था। इसी दौड़ ने जिससे मोमिन बिल्कुल ग़ाफ़िल था। उसके लहू के हर क़तरे में सनसनी पैदा कर दी थी। वो इसका मतलब समझने की कोशिश करता था मगर नाकाम रहता था। 

उसके जिस्म में कई तबदीलियां रुनुमा हो रही थीं। गर्दन जो पहले पतली थी, अब मोटी हो गई थी। बांहों के पट्ठों में एँठन सी पैदा हो गई थी। कंठ निकल रहा था। सीने पर गोश्त की तह मोटी हो गई थी और अब कुछ दिनों से पिस्तानों में गोलियां सी पड़ गई थीं, जगह उभर आई थी, जैसे किसी ने एक एक बरनटा अंदर दाख़िल कर दिया है। उन उभारों को हाथ लगाने से मोमिन को बहुत दर्द महसूस होता था। 

कभी कभी काम करने के दौरान में ग़ैर इरादी तौर पर जब उसका हाथ उन गोलियों से छू जाता तो वो तड़प उठता। क़मीज़ के मोटे और खुरदरे कपड़े से भी उसको तकलीफ़देह सरसराहट महसूस होती थी। 

ग़ुसलख़ाने में नहाते वक़्त या बावर्चीख़ाने में जब कोई और मौजूद न हो मोमिन अपनी क़मीज़ के बटन खोल कर उन गोलियों को ग़ौर से देखता था। हाथों से मसलता था। दर्द होता, टीसें उठतीं। उसका सारा जिस्म फलों से लदे हुए पेड़ की तरह जिसे ज़ोर से हिलाया गया हो काँप काँप जाता। मगर इसके बावजूद वो इस दर्द पैदा करने वाले खेल में मशग़ूल रहता था। 

कभी कभी ज़्यादा दबाने पर ये गोलियां पिचक जातीं और उनके मुँह से लेसदार लुआब निकल आता। उसको देख कर उसका चेहरा कान की लवों तक सुर्ख़ हो जाता। वो समझता कि उससे कोई गुनाह सरज़द हो गया है। 

गुनाह और सवाब के मुतअल्लिक़ मोमिन का इल्म बहुत महदूद था। हर वो फ़ेअल जो एक इंसान दूसरे इंसानों के सामने न कर सकता हो, उसके ख़याल के मुताबिक़ गुनाह था। चुनांचे जब शर्म के मारे उसका चेहरा कान की लौ तक सुर्ख़ हो जाता तो वो झट से अपनी क़मीज़ के बटन बंद कर लेता कि आइन्दा ऐसी फ़ुज़ूल हरकत कभी नहीं करेगा। लेकिन इस अह्द के बावजूद दूसरे तीसरे रोज़ तख़लिए में वो फिर इस खेल में मशग़ूल हो जाता।

मोमिन से घर वाले सब ख़ुश थे। वो बड़ा मेहनती लड़का था। हर काम वक़्त पर कर देता था और किसी शिकायत का मौक़ा न देता था। डिप्टी साहब के यहां उसे काम करते हुए सिर्फ़ तीन महीने हुए थे लेकिन इस क़लील अर्से में उसने घर के हर फ़र्द को अपनी मेहनतकश तबीयत से मुतास्सिर कर लिया था। 

छः रुपये महीने पर वो नौकर हुआ था। मगर दूसरे महीने ही उसकी तनख़्वाह में दो रुपये बढ़ा दिए गए थे। वो इस घर में बहुत ख़ुश था। इसलिए कि उसकी यहां क़दर की जाती थी। मगर अब कुछ दिनों से वो बेक़रार था। एक अजीब क़िस्म की आवारगी उसके दिमाग़ में पैदा हो गई थी। उसका जी चाहता था कि सारा दिन बेमतलब बाज़ारों में घूमता फिरे या किसी सुनसान मुक़ाम पर जा कर लेटा रहे। 

अब काम में उसका जी नहीं लगता था लेकिन इस बेदिली के होते हुए भी वो काहिली नहीं बरतता था। चुनांचे यही वजह है कि घर में कोई भी उसके अंदरूनी इंतिशार से वाक़िफ़ नहीं था। रज़िया थी सो वो दिन भर बाजा बजाने, नई नई फ़िल्मी तरज़ें सीखने और रिसाले पढ़ने में मसरूफ़ रहती थी। 

उसने कभी मोमिन की निगरानी ही नहीं की थी। शकीला अलबत्ता मोमिन से इधर-उधर के काम लेती थी और कभी-कभी उसे डाँटती भी थी। मगर अब कुछ दिनों से वो भी चंद ब्लाउज़ों के नमूने उतारने में बेतरह मशग़ूल थी। ये ब्लाउज़ उसकी एक सहेली के थे, जिसे नई नई तराशों के कपड़े पहनने का बहुत शौक़ था। 

शकीला उससे आठ ब्लाउज़ मांग कर लाई थी और काग़ज़ों पर उनके नमूने उतार रही थी। चुनांचे उसने भी कुछ दिनों से मोमिन की तरफ़ ध्यान नहीं दिया था। 

डिप्टी साहब की बीवी सख़्तगीर औरत नहीं थी। घर में दो नौकर थे यानी मोमिन के इलावा एक बुढ़िया भी थी। ज़्यादातर बावर्चीख़ाने का काम यही करती थी। मोमिन कभी कभी उसका हाथ बटा दिया करता था। डिप्टी साहब की बीवी ने मुम्किन है मोमिन की मुस्तइद्दी में कोई कमी देखी हो। मगर उसने मोमिन से इसका ज़िक्र नहीं किया था और वो इन्क़िलाब जिसमें से मोमिन का दिल-ओ-दिमाग़ और जिस्म गुज़र रहा था। उससे तो डिप्टी साहब की बीवी बिल्कुल ग़ाफ़िल थी। 

चूँकि उसका कोई लड़का नहीं था इसलिए वो, मोमिन की ज़ेहनी और जिस्मानी तबदीलियों को नहीं समझ सकती थी और फिर मोमिन नौकर था... नौकरों के मुतअल्लिक़ कौन ग़ौर-ओ-फ़िक्र करता है? बचपन से लेकर बुढ़ापे तक वो तमाम मंज़िलें पैदल तय कर जाते हैं और आस-पास के आदमियों को ख़बर तक नहीं होती। 

मोमिन का भी बिल्कुल यही हाल था। वो कुछ दिनों से मोड़ मुड़ता ज़िंदगी के एक ऐसे रास्ते पर आ निकला था जो ज़्यादा लंबा तो नहीं था, मगर बेहद पुरख़तर था। उस रास्ते पर उसके क़दम कभी तेज़ तेज़ उठते थे। कभी हौले-हौले। 

वो दरअसल जानता नहीं था कि ऐसे रास्तों पर किस तरह चलना चाहिए। उन्हें जल्दी तय कर जाना चाहिए या कुछ वक़्त लेकर आहिस्ता-आहिस्ता इधर-उधर की चीज़ों का सहारा लेकर तय करना चाहिए। मोमिन के नंगे पांव के नीचे आने वाले शबाब की गोल गोल चिकनी बट्टियां फिसल रही थीं। वो अपना तवाज़ुन बरक़रार नहीं रख सकता था। 

वो बेहद मुज़्तरिब था। इसी इज़्तिराब के बाइस कई बार काम करते करते चौंक कर वो ग़ैर इरादी तौर पर किसी खूंटी को दोनों हाथों से पकड़ लेता और उसके साथ लटक जाता। फिर उसके दिल में ख़्वाहिश पैदा होती कि टांगों से पकड़ कर उसे कोई, इतना खींचे कि वो एक महीन तार बन जाये। ये सब बातें उसके दिमाग़ के किसी ऐसे गोशे में पैदा होती थीं कि वो ठीक तौर पर उनका मतलब नहीं समझ सकता था। 

ग़ैर शुऊरी तौर पर वो चाहता था कि कुछ हो... क्या हो?... बस कुछ हो। मेज़ पर करीने से चुनी हुई प्लेटें एक दम उछलना शुरू कर दें। केतली पर रखा हुआ ढकना पानी के एक ही उबाल से ऊपर को उड़ जाये। नल की जसती नाली पर दबाव डाले तो वो दुहरी हो जाये और उसमें से पानी का एक फ़व्वारा सा फूट निकले। 

उसे एक ऐसी ज़बरदस्त अंगड़ाई आए कि उसके सारे जोड़ अलाहिदा अलाहिदा हो जाएं और एक ढीलापन पैदा हो जाये... कोई ऐसी बात वक़ूअ पज़ीर हो जो उसने पहले कभी न देखी हो। 

मोमिन बहुत बेक़रार था। 

रज़िया नई फ़िल्मी तरज़ें सीखने में मशग़ूल थी और शकीला काग़ज़ों पर ब्लाउज़ों के नमूने उतार रही थी और जब उसने ये काम ख़त्म कर लिया तो वो नमूना जो उनमें सब से अच्छा था, सामने रख कर अपने लिए ऊदी साटन का ब्लाउज़ बनाना शुरू किया। अब रज़िया को भी अपना बाजा और फ़िल्मी गानों की कापी छोड़कर उसकी तरफ़ मुतवज्जा होना पड़ा। 

शकीला हर काम बड़े एहतिमाम और चाव से करती थी। जब सीने-पिरोने बैठती तो उसकी नशिस्त बड़ी पुर इत्मिनान होती थी। अपनी छोटी बहन रज़िया की तरह वो अफ़रातफ़री पसंद नहीं करती थी। एक एक टांका सोच समझ कर बड़े इत्मिनान से लगाती थी ताकि ग़लती का इमकान न रहे। पैमाइश भी उसकी बहुत सही होती थी। इसलिए कि वो पहले काग़ज़ काट कर फिर कपड़ा काटती थी। यूं वक़्त ज़्यादा सर्फ़ होता था, मगर चीज़ बिल्कुल फ़िट तैयार होती थी। 

शकीला भरे-भरे जिस्म की सेहतमंद लड़की थी। उसके हाथ बहुत गुदगुदे थे, गोश्त भरी मख़्रूती उंगलियों के आख़िर में हर जोड़ पर एक नन्हा गढ़ा था। जब वो मशीन चलाती थी ये नन्हे-नन्हे गढ़े हाथ की हरकत से कभी कभी ग़ायब भी हो जाते थे। 

शकीला मशीन भी बड़े इत्मिनान से चलाती थी। आहिस्ता आहिस्ता उसकी दो या तीन उंगलियां बड़ी रानाई के साथ मशीन की हथि को घुमाती थी, उसकी कलाई में एक हल्का सा ख़म पैदा हो जाता था। गर्दन ज़रा उस तरफ़ को झुक जाती थी और बालों की एक लट जिसे शायद अपने लिए कोई मुस्तक़िल जगह नहीं मिलती थी नीचे फिसल आती थी। शकीला अपने काम में इस क़दर मुनहमिक रहती कि उसे हटाने या जमाने की कोशिश नहीं करती थी। 

जब शकीला ऊदी साटन सामने फैला कर अपने माप का ब्लाउज़ तराशने लगी तो उसे टेप की ज़रूरत महसूस हुई, क्योंकि उनका अपना टेप घिस घिसा कर अब बिल्कुल टुकड़े टुकड़े हो गया था। लोहे का ग़ज़ मौजूद था। मगर उससे कमर और सीने की पैमाइश कैसे हो सकती है। उसके अपने कई ब्लाउज़ मौजूद थे मगर अब चूँकि वो पहले से कुछ मोटी हो गई थी इसलिए सारी पैमाइशें दुबारा करना चाहती थी। 

क़मीज़ उतार कर उसने मोमिन को आवाज़ दी। जब वो आया तो उससे कहा, “जाओ मोमिन दौड़ कर छः नंबर से कपड़े का ग़ज़ ले आओ। कहना शकीला बीबी मांगती हैं।” 

मोमिन की निगाहें शकीला की सफ़ेद बनियान के साथ टकराईं। वो कई बार शकीला बीबी को ऐसी बनियानों में देख चुका था मगर आज उसे एक क़िस्म की झिजक महसूस हुई। उसने अपनी निगाहों का रुख़ दूसरी तरफ़ फेर लिया और घबराहट में कहा, “कैसा गज़ बीबी जी।” 

शकीला ने जवाब दिया, “कपड़े का ग़ज़... एक गज़ तो ये तुम्हारे सामने पड़ा है, ये लोहे का है। एक दूसरा गज़ भी होता है जो कपड़े का बना होता है। जाओ छः नंबर में जाओ और दौड़ के उनसे ये गज़ ले आओ। कहना शकीला बीबी मांगती हैं।” 

छः नंबर का फ़्लैट बिल्कुल क़रीब था। मोमिन फ़ौरन ही कपड़े का ग़ज़ लेकर आगया। शकीला ने ये गज़ उसके हाथ से लिया और कहा, “यहीं ठहर जाओ। उसे अभी वापस ले जाना।” फिर वो अपनी बहन रज़िया से मुख़ातिब हुई, “इन लोगों की कोई चीज़ ज़्यादा देर अपने पास रख ली जाये तो वो बुढ़िया तक़ाज़े कर करके परेशान कर देती है... इधर आओ और ये गज़ लो और यहां से मेरा नाप लो।” 

रज़िया ने शकीला की कमर और सीने का नाप लेना शुरू किया तो उनके दरमियान कई बातें हुई। मोमिन दरवाज़े की दहलीज़ में खड़ा तकलीफ़देह ख़ामोशी से ये बातें सुनता रहा। 

“रज़िया तुम गज़ को खींच कर नाप क्यों नहीं लेतीं... पिछली दफ़ा भी यही हुआ। तुमने नाप लिया और मेरे ब्लाउज़ का सत्यानास हो गया। ऊपर के हिस्से पर अगर कपड़ा फिट न आए तो इधर उधर बग़लों में झोल पड़ जाते हैं।” 

“कहाँ का लूं, कहाँ का न लूं। तुम तो अजब मख़मसे में डाल देती हो। यहां का नाप लेना शुरू किया था तो तुमने कहा ज़रा और नीचे कर लो... ज़रा छोटा बड़ा हो गया तो कौन सी आफ़त आ जाएगी।” 

“भई वाह... चीज़ के फ़िट होने में तो सारी ख़ूबसूरती है। सुरय्या को देखो, कैसे फ़िट कपड़े पहनती है। मजाल है जो कहीं शिकन पड़े, कितने ख़ूबसूरत मालूम होते हैं ऐसे कपड़े... लो अब तुम नाप को...” 

ये कह कर शकीला ने सांस के ज़रिये से अपना सीना फुलाना शुरू किया। जब अच्छी तरह फूल गया तो सांस रोक कर उसने घुटी घुटी आवाज़ में कहा, “लो अब जल्दी करो।” 

जब शकीला ने सीने की हवा ख़ारिज की तो मोमिन को ऐसा महसूस हुआ, उसके अंदर के कई गुब्बारे फट गए हैं। उसने घबरा कर कहा, “गज़ लाइए बीबी जी... मैं दे आऊं।” 

शकीला ने उसे झिड़क दिया, “ज़रा ठहर जाओ।” 

ये कहते हुए कपड़े का ग़ज़ उसके नंगे बाज़ू से लिपट गया। जब शकीला ने उसे उतारने की कोशिश की तो मोमिन को सफ़ेद बग़ल में काले काले बालों का एक गुच्छा नज़र आया। मोमिन की अपनी बग़लों में भी ऐसे ही बाल उग रहे थे। मगर ये गुच्छा उसे बहुत भला मालूम हुआ। 

एक सनसनी सी उसके सारे बदन में दौड़ गई। एक अजीब-ओ-ग़रीब ख़्वाहिश उसके दिल में पैदा हुई कि काले काले बाल उसकी मूंछें बन जाएं... बचपन में वो भुट्टों के काले और सुनहरे बाल निकाल कर अपनी मूंछें बनाया करता था। उनको अपने बालाई होंट पर जमाते वक़्त जो सरसराहट उसे महसूस हुआ करती थी, उसी क़िस्म की सरसराहट इस ख़्वाहिश ने उसके बालाई होंट और नाक में पैदा कर दी। 

शकीला का बाज़ू अब नीचे झुक गया था और उसकी बग़ल छुप गई थी। मगर मोमिन अब भी काले काले बालों का वो गुच्छा देख रहा था। उसके तसव्वुर में शकीला का बाज़ू देर तक वैसे ही उठा रहा और बग़ल में उसके स्याह बाल झांकते रहे। 

थोड़ी देर के बाद शकीला ने मोमिन को गज़ दे दिया और कहा, “जाओ, उसे वापस दे आओ। कहना बहुत बहुत शुक्रिया अदा किया है।” 

मोमिन गज़ वापस दे कर बाहर सहन में बैठ गया। उसके दिल-ओ-दिमाग़ में धुँदले धुँदले से ख़याल पैदा हो रहे थे। देर तक वो उनका मतलब समझने की कोशिश करता रहा। जब कुछ समझ में न आया तो उसने ग़ैर इरादी तौर पर अपना छोटा सा ट्रंक खोला जिसमें उसने ईद के लिए नए कपड़े बनवा कर रखे थे। 

जब ट्रंक का ढकना खुला और नए लट्ठे की बू उसकी नाक तक पहुंची तो उसके दिल में ख़्वाहिश पैदा हुई कि नहा-धो कर और ये नए कपड़े पहन कर वो सीधा शकीला बीबी के पास जाये और उसे सलाम करे... उसकी लट्ठे की शलवार किस तरह खड़ खड़ करेगी और उसकी रूमी टोपी... 

रूमी टोपी का ख़याल आते ही मोमिन की निगाहों के सामने उसका फुंदना आगया और फुंदना फ़ौरन ही उन काले काले बालों के गुच्छे में तबदील हो गया, जो उसने शकीला की बग़ल में देखा था। 

उसने कपड़ों के नीचे से अपनी नई रूमी टोपी निकाली और उसके नर्म और लचकीले फुंदने पर हाथ फेरना शुरू ही किया था कि अंदर से शकीला बीबी की आवाज़ आई, “मोमिन।” 

मोमिन ने टोपी ट्रंक में रखी, ढकना बंद किया और अन्दर चला गया। जहां शकीला नमूने के मुताबिक़ ऊदी साटन के कई टुकड़े काट चुकी थी। 

उन चमकीले और फिसल फिसल जाने वाले टुकड़ों को एक जगह रख कर वो मोमिन की तरफ़ मुतवज्जा हुई, “मैंने तुम्हें इतनी आवाज़ें दीं। सो गए थे क्या?” 

मोमिन की ज़बान में लुक़्नत पैदा हो गई, “नहीं बीबी जी।” 

“तो क्या कर रहे थे?” 

“कुछ... कुछ भी नहीं?” 

“कुछ तो ज़रूर करते होगे,” शकीला ये सवाल किए जा रही थी। मगर उसका ध्यान असल में ब्लाउज़ की तरफ़ था जिसे अब उसे कच्चा करना था। 

मोमिन ने खिसियानी हंसी के साथ जवाब दिया, “ट्रंक खोल कर अपने नए कपड़े देख रहा था।” 

शकीला खिलखिला कर हंसी। रज़िया ने भी उसका साथ दिया। 

शकीला को हंसते देख कर मोमिन को एक अजीब सी तस्कीन हुई और उस तस्कीन ने उसके दिल में ये ख़्वाहिश पैदा की कि वो कोई ऐसी मज़हकाख़ेज़ तौर पर अहमक़ाना हरकत करे जिससे शकीला को और ज़्यादा हँसने का मौक़ा मिले। चुनांचे लड़कियों की तरह झेंप कर और लहजे में शर्माहट पैदा करके उसने कहा, “बड़ी बीबी जी से पैसे लेकर मैं रेशमी रूमाल भी लाऊँगा।” 

शकीला ने हंसते हुए उससे पूछा, “क्या करोगे उस रूमाल को?” 

मोमिन ने झेंप कर जवाब दिया, “गले में बांध लूंगा बीबी जी... बड़ा अच्छा मालूम होगा।” 

ये सुन कर शकीला और रज़िया दोनों देर तक हंसती रहीं। 

“गले में बांधोगे तो याद रखना मैं उसी से फांसी दे दूंगी तुम्हें।” ये कह कर शकीला ने अपनी हंसी दबाने की कोशिश की और रज़िया से कहा, “कम्बख़्त ने मुझे काम ही भुला दिया। रज़िया मैंने इसे क्यों बुलाया था?” 

रज़िया ने जवाब न दिया और वो नई फ़िल्मी तर्ज़ गुनगुनाना शुरू की जो वो दो रोज़ से सीख रही थी। इस दौरान में शकीला को ख़ुद ही याद आ गया कि उसने मोमिन को क्यों बुलाया था, “देखो मोमिन। मैं तुम्हें ये बनियान उतार कर देती हूँ। दवाईयों की दूकान के पास जो एक दुकान नई खुली है ना, वही जहां तुम उस दिन मेरे साथ गए थे। वहां जाओ और पूछ के आओ कि ऐसी छः बिनयानों का वो क्या लेगा... कहना हम पूरी छः लेंगे। इसलिए कुछ रियायत ज़रूर करे... समझ लिया ना?” 

मोमिन ने जवाब दिया, “जी हाँ।” 

“अब तुम परे हट जाओ।” 

मोमिन बाहर निकल कर दरवाज़े की ओट में हो गया। चंद लम्हात के बाद बनियान उसके क़दमों के पास आकर गिरा और अंदर से शकीला की आवाज़ आई, “कहना हम इसी क़िस्म, इसी डिज़ाइन की बिल्कुल यही चीज़ लेंगे। फ़र्क़ नहीं होना चाहिए।” 

मोमिन ने “बहुत अच्छा” कह कर बनियान उठा लिया जो पसीने के बाइस कुछ कुछ गीला हो रहा था जैसे किसी ने भाप पर रख कर फ़ौरन ही हटा लिया हो। बदन की बू भी उसमें बसी हुई थी। मीठी मीठी गर्मी भी थी। ये तमाम चीज़ें उसको बहुत भली मालूम हुईं। 

वो इस बनियान को जो बिल्ली के बच्चे की तरह मुलायम था, अपने हाथों में मसलता बाहर चला गया। जब भाव वाओ दरयाफ़्त करके बाज़ार से वापस आया तो शकीला ब्लाउज़ की सिलाई शुरू कर चुकी थी। उस स्याही माइल साटन के ब्लाउज़ की जो मोमिन की रूमी टोपी के फुंदने से कहीं ज़्यादा चमकीली और लचकदार थी। 

ये ब्लाउज़ शायद ईद के लिए तैयार किया जा रहा था क्योंकि ईद अब बिल्कुल क़रीब आ गई थी। मोमिन को एक दिन में कई बार बुलाया गया। धागा लाने के लिए, इस्त्री निकालने के लिए। सूई टूटी तो नई सूई लाने के लिए। 

शाम के क़रीब जब शकीला ने दूसरे रोज़ पर बाक़ी काम उठा दिया तो धागे के टुकड़े और ऊदी साटन की बेकार कतरनें उठाने के लिए भी उसे बुलाया गया। मोमिन ने अच्छी तरह जगह साफ़ कर दी। 

बाक़ी सब चीज़ें उठा कर बाहर फेंक दीं। मगर ऊदी साटन की चमकदार कतरनें अपनी जेब में रख लीं... बिल्कुल बेमतलब क्योंकि उसे मालूम नहीं था कि वो उनको क्या करेगा? 

दूसरे रोज़ उसने जेब से कतरनें निकालीं और अलग बैठ कर उनके धागे अलग करने शुरू कर दिए। देर तक वो इस खेल में मशग़ूल रहा। हत्ता कि धागे के छोटे-बड़े टुकड़ों का एक गुच्छा सा बन गया। उसको हाथ में लेकर वो दबाता रहा, मसलता रहा... लेकिन उसके तसव्वुर में शकीला की वही बग़ल थी जिसमें उसने काले-काले बालों का छोटा सा गुछा देखा था। 

उस दिन भी उसे शकीला ने उसे कई बार बुलाया... काली साटन के ब्लाउज़ की हर शक्ल उसकी निगाहों के सामने आती रही। पहले जब उसे कच्चा किया गया था तो उस पर सफ़ेद धागे के बड़े बड़े टाँके जा-ब-जा फैले हुए थे। फिर उस पर इस्त्री की गई। जिससे सब शिकनें दूर हो गईं और चमक भी दो बाला हो गई। 

उसके बाद कच्ची हालत ही में शकीला ने उसे पहना, रज़िया को दिखाया। दूसरे कमरे में सिंघार मेज़ के पास जा कर आईने में ख़ुद उसको हर पहलू से अच्छी तरह देखा। जब पूरा इत्मिनान हो गया तो उसे उतारा, जहां-जहां तंग या खुला था, वहां निशान बनाए और उसकी सारी खामियां दूर कीं। एक बार फिर पहन कर देखा। जब बिल्कुल फिट हो गया तो पक्की सिलाई शुरू की।

उधर ऊदी साटन का ये ब्लाउज़ सिया जा रहा था। उधर मोमिन के दिमाग़ में अजीब-ओ-ग़रीब ख़यालों के जैसे टाँके से उधड़ रहे थे... जब उसे कमरे में बुलाया जाता और उसकी निगाहें चमकीली साटन के ब्लाउज़ पर पड़तीं तो उसका जी चाहता कि वो हाथ से छू कर उसे देखे। सिर्फ़ छू कर ही नहीं देखे... बल्कि उसकी मुलायम और रोएँदार सतह पर देर तक हाथ फेरता रहे... अपने खुरदरे हाथ। 

उसने उन साटन के टुकड़ों से उसकी मुलायमी का अंदाज़ा कर लिया था। धागे जो उसने इन टुकड़ों से निकाले थे और भी ज़्यादा मुलायम हो गए थे। जब उसने उनका गुच्छा बनाया था तो दबाते वक़्त उसे मालूम हुआ कि उनमें रबड़ सी लचक भी है। 

वो जब अंदर आकर ब्लाउज़ को देखता उसका ख़याल फ़ौरन उन बालों की तरफ़ दौड़ जाता जो उसने शकीला की बग़ल में देखे थे। काले काले बाल मोमिन सोचता था, क्या वो भी इस साटन ही की तरह मुलायम होंगे। 

ब्लाउज़ बिलआख़िर तैयार हो गया... मोमिन कमरे के फ़र्श पर गीला कपड़ा फेर रहा था कि शकीला अंदर आई। क़मीज़ उतार कर उसने पलंग पर रखी। उसके नीचे उसी क़िस्म का सफ़ेद बनियान था जिसका नमूना लेकर मोमिन भाव दरयाफ़्त करने गया था... उसके ऊपर शकीला ने अपने हाथ का सिला हुआ ब्लाउज़ पहना। सामने के हुक लगाए और आईने के सामने खड़ी हो गई।मोमिन ने फ़र्श साफ़ करते करते आईने की तरफ़ देखा। 

ब्लाउज़ में अब जान सी पड़ गई थी... एक दो जगह पर वो इस क़दर चमकता था कि मालूम होता था साटन का रंग सफ़ेद हो गया है... शकीला की पीठ मोमिन की तरफ़ थी जिस पर रीढ़ की हड्डी की लंबी झुर्री। ब्लाउज़ फ़िट होने के बाइस अपनी पूरी गहराई के साथ नुमायां थी, मोमिन से न रहा गया। चुनांचे उसने कहा, “बीबी जी। आपने तो दर्ज़ियों को भी मात कर दिया!” 

शकीला अपनी तारीफ़ सुन कर ख़ुश हुई। मगर वो रज़िया की राय तलब करने के लिए बेक़रार थी। इसलिए वो सिर्फ़ अच्छा सिला है न? कह कर बाहर दौड़ गई... मोमिन आईने की तरफ़ देखता रह गया जिसमें ब्लाउज़ का स्याह और चमकीला अक्स देर तक मौजूद रहा। 

रात को जब वो फिर उस कमरे में सुराही रखने के लिए आया तो उसने खूंटी पर लकड़ी के हैंगर में उस ब्लाउज़ को देखा। कमरे में कोई मौजूद नहीं था। चुनांचे आगे बढ़ कर पहले उसने ग़ौर से देखा। फिर डरते डरते उस पर हाथ फेरा। ऐसा करते हुए उसे ये महसूस हुआ कि कोई उसके जिस्म के मुलायम रोएँ पर हौले-हौले बिल्कुल हवाई लम्स की तरह हाथ फेर रहा है। 

रात को जब वो सोया तो उसने कई ऊट-पटांग ख़्वाब देखे... डिप्टी साहब ने पत्थर के कोयलों का एक बड़ा ढेर उसे कूटने को कहा। जब उसने एक कोयला उठाया और उस पर हथौड़े की एक ज़र्ब लगाई तो वो नर्म-नर्म बालों का एक गुच्छा बन गया... ये काली खांड के महीन महीन तार थे जिन का गोला बना हुआ था... फिर ये गोले काले रंग के गुब्बारे बन कर हवा में उड़ना शुरू हुए... बहुत ऊपर जा कर ये फटने लगे। 

फिर आंधी आ गई और मोमिन की रूमी टोपी का फुंदना कहीं ग़ायब हो गया... फुंदने की तलाश में वो निकला... देखी और अनदेखी जगहों में घूमता रहा... नए लट्ठे की बू भी कहीं से आना शुरू हुई। फिर न जाने क्या हुआ। एक काली साटन के ब्लाउज़ पर उसका हाथ पड़ा... कुछ देर वो इस धड़कती हुई चीज़ पर हाथ फेरता रहा। फिर दफ़अतन हड़बड़ा के उठ बैठा। 

थोड़ी देर तक वो कुछ न समझ सका कि क्या हो गया है। इसके बाद उसे ख़ौफ़, तअज्जुब और एक अनोखी टीस का एहसास हुआ। उसकी हालत उस वक़्त अजीब-ओ-ग़रीब थी... पहले उसे तकलीफ़देह हरारत महसूस हुई थी मगर चंद लमहात के बाद एक ठंडी सी लहर उसके जिस्म पर रेंगने लगी। 

STORY TELLER:- SAGAR KUMAR



जानें कहां से आया भोलेनाथ के पास त्रिशूल, डमरू और नाग

भगवान श‌िव का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छव‌ि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की। इनके एक हाथ में त्र‌िशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर...